Tuesday, March 31, 2026

मथुरा में आईपीआर कार्यशाला: शोध को मिले संरक्षण की सीख

लेखक: Jagran Today | Category: उत्तर प्रदेश | Published: March 28, 2026

मथुरा में आईपीआर कार्यशाला: शोध को मिले संरक्षण की सीख

दिनेश कुमार, मथुरा

मथुरा स्थित उत्तर प्रदेश पंडित दीन दयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय एवं गो-अनुसंधान संस्थान में बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। अध्यक्षता कुलपति डॉ. अभिजित मित्र ने की। कार्यशाला का उद्देश्य संकाय सदस्यों और शोधार्थियों को बौद्धिक संपदा अधिकारों के महत्व से अवगत कराना तथा पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क समेत अन्य संरक्षण प्रक्रियाओं की विस्तृत जानकारी देना रहा।


कार्यशाला में मुख्य वक्ता डॉ. प्रमोद कुमार पांडेय ने बौद्धिक संपदा अधिकारों की विभिन्न श्रेणियों और उन्हें प्राप्त करने की प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि शोध और नवाचार को सुरक्षित करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि उसका लाभ व्यापक स्तर पर मिल सके।

डॉ. अशोक कुमार ने नवाचार और अनुसंधान के व्यावसायीकरण में पेटेंट की भूमिका के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि भारत में पेटेंट दाखिल करने की संख्या लगातार बढ़ रही है और इसमें सरकारी संस्थानों की अहम भूमिका है। उन्होंने यह भी बताया कि यदि शोध को सही दिशा में संरक्षित किया जाए, तो वह देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

डॉ. रवि रंजन ने पेटेंट फाइलिंग, कॉपीराइट प्राधिकरण, तकनीकी हस्तांतरण, ट्रेडमार्क और वैज्ञानिक प्रकाशन से जुड़े व्यावहारिक पहलुओं की जानकारी दी। उन्होंने प्रतिभागियों को बताया कि किस प्रकार अपने शोध कार्य को कानूनी सुरक्षा प्रदान की जा सकती है।

डॉ. प्रमोद कुमार पांडेय ने कहा कि भारत में शोध कार्य तो व्यापक स्तर पर हो रहा है, लेकिन उसका पेटेंट, कॉपीराइट और ट्रेडमार्क में अपेक्षित रूपांतरण नहीं हो पा रहा है। इसके चलते शोध की उपयोगिता सीमित रह जाती है। उन्होंने बौद्धिक संपदा के ऐतिहासिक विकास का उल्लेख करते हुए बताया कि यह प्राचीन व्यापारिक परंपराओं से विकसित होकर आज वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण विधिक ढांचे का हिस्सा बन चुका है।

कुलपति डॉ. अभिजित मित्र ने कहा कि पेटेंट, ट्रेडमार्क और भौगोलिक संकेतक (जीआई) जैसे माध्यमों से बौद्धिक संपदा की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों और संकाय सदस्यों को अनुसंधान, नवाचार और अपनी बौद्धिक उपलब्धियों के संरक्षण के प्रति सजग रहने की प्रेरणा दी। साथ ही उन्होंने संस्थान में जागरूकता बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप आईपीआर प्रणाली विकसित करने पर बल दिया।

कार्यशाला का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि विश्वविद्यालय में नवाचार आधारित वातावरण को मजबूत किया जाएगा और आईपीआर प्रक्रियाओं के व्यावहारिक उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे राष्ट्रीय विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में योगदान सुनिश्चित हो सके।

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