जागरण टुडे, वृंदावन। वृंदावन शोध संस्थान (VRI) में रविवार से शुरू हुआ आठ दिवसीय सांझी महोत्सव ब्रज की समृद्ध परंपराओं और संस्कृति का जीवंत उत्सव बन गया। महोत्सव के शुभारंभ अवसर पर “ब्रज की सांझी और विविधताएं” विषयक संगोष्ठी, प्रदर्शनी और सांझी विवरणिका का लोकार्पण हुआ।
कार्यक्रम का उद्घाटन दीप प्रज्वलन, ठा. बांकेबिहारी के चित्रपट पर माल्यार्पण और भूमिका उपाध्याय द्वारा सांझी पद गायन से हुआ। इसके बाद विभिन्न प्रकार की सांझियों का प्रस्तुतिकरण किया गया।
पद्मश्री कृष्णा कन्हाई ने कहा कि ब्रज की सांझी कला अब अंतर्राष्ट्रीय पहचान बना रही है, और इसका श्रेय ब्रज के कलाकारों, सेवायतों और ब्रजवासियों को जाता है। मुख्य वक्ता डॉ. नृत्यगोपाल ने बताया कि सांझी कला साहित्य, संगीत और प्रस्तुतिकरण तीनों क्षेत्रों में अभिव्यक्त होती है। विशाल लाल गोस्वामी ने कहा कि इसमें राधा-कृष्ण की नित्य विहार लीलाओं का चित्रण तन्मयता से होता है।
अध्यक्ष डॉ. नटवर नागर ने कहा कि सांझी केवल कला नहीं, बल्कि एक अनुष्ठान है, जिसे ब्रज में लोक मातृका के रूप में पूजा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह पितरों की माता मानी गई है। डॉ. विनोद बनर्जी ने संस्थान द्वारा इस कला के संरक्षण हेतु किए जा रहे प्रयासों की सराहना की।
आचार्य विभुकृष्ण भट्ट ने रंग सांझी, आचार्य सुमित गोस्वामी ने जल सांझी का प्रस्तुतिकरण किया। वनस्थली विद्यापीठ की शोध छात्रा मुस्कान अग्रवाल ने सांझी परंपरा को वस्त्र-परिधानों पर प्रदर्शित किया। वहीं, डॉ. रोली तिवारी और उनकी छात्राओं ने गोबर निर्मित सांझी और लोकगीत की प्रस्तुति दी। सांस्कृतिक कार्यक्रम में डॉ. ब्रजभूषण चतुर्वेदी, अशोक अज्ञ और भगवान दास ने सांझी गीत प्रस्तुत किए। कार्यक्रम का संचालन डॉ. राजेश शर्मा ने किया।
इस अवसर पर अनघा श्रीनिवासन (सीईओ श्रीरंगनाथ मंदिर), सुकृतलाल गोस्वामी, उदयन शर्मा, चंद्रप्रताप सिंह, सुमनकांत पालीवाल, डॉ. गोविंदकृष्ण पाठक, आचार्य अंबरीष भट्ट गोस्वामी सहित अनेक विद्वान, शोधार्थी और कला प्रेमी मौजूद रहे।