प्रयागराज/लखनऊ। बरेली में 26 सितंबर 2025 को हुई हिंसा से जुड़ी FIR रद्द कराने की कोशिश याची अदनान के लिए उल्टी पड़ गई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका को कठोर टिप्पणी करते हुए न सिर्फ खारिज किया, बल्कि साफ कहा कि “ऐसी गंभीर और समाज विरोधी घटनाओं में FIR रद्द करने की मांग न्याय की बुनियाद हिला देती है।” अदालत ने टिप्पणी की कि याची के खिलाफ प्रथम दृष्टया अपराध के स्पष्ट और ठोस संकेत मौजूद हैं, ऐसे में FIR रद्द करना कानून-व्यवस्था और निष्पक्ष विवेचना दोनों को चोट पहुँचाना होगा।
पीठ ने साफ कहा कि शुरुआती चरण में FIR खत्म करना जांच को पंगु बना देता है और अपराधियों को गलत संदेश पहुंचाता है। अदालत ने याची को अन्य कानूनी उपाय अपनाने की छूट जरूर दी, लेकिन FIR रद्द करने का कोई आधार स्वीकार नहीं किया।
भीड़ की बर्बरता: पुलिस पर तेजाब, ईंट-पत्थर और गोलियां
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी और सहायक महाधिवक्ता पारितोष मालवीय ने अदालत को घटनास्थल की भयावह तस्वीर सामने रखी। उन्होंने बताया कि घटना वाले दिन 200–250 लोगों की उग्र भीड़ ने पुलिस पर पत्थरों और ईंटों की बारिश कर दी। तेजाब से भरी बोतलें फेंकी गईं और भीड़ की ओर से गोलियां तक चलाई गईं।
कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए, दो अधिकारियों के कपड़े तक फट गए। हालात इतने विकराल हुए कि पुलिस को मजबूर होकर आत्मरक्षा में फायरिंग करनी पड़ी। सरकार का तर्क था कि ऐसी भीषण हिंसा में शामिल आरोपियों को शुरुआती स्तर पर ही राहत मिलना विधि-व्यवस्था पर सीधा प्रहार होगा।
तौकीर रज़ा के आह्वान के बाद भड़की भीड़, निषेधाज्ञा की खुली धज्जियाँ
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि आइएमसी प्रमुख मौलाना तौकीर रज़ा ने पोस्टर विवाद को लेकर भीड़ जुटाने की अपील की थी। हालांकि वह खुद मौके पर नहीं पहुंचे, लेकिन उनके आह्वान पर निषेधाज्ञा (बीएनएस 163) लागू होने के बावजूद भीड़ एकत्र हो गई।
मौलाना आज़ाद इंटर कॉलेज से श्यामगंज चौराहे तक भीड़ भड़काऊ नारे लगाते हुए आगे बढ़ी। पुलिस ने कई बार रोकने और समझाने की कोशिश की, मगर भीड़ और उग्र हो गई तथा पथराव शुरू कर दिया।
तौकीर रज़ा पर दर्ज 30 मुकदमे, 7 में नामजद
सरकारी अधिवक्ता ने बताया कि बरेली हिंसा और इससे जुड़े मामलों में मौलाना तौकीर रज़ा पर 5 थानों में कुल 30 मुकदमे दर्ज हैं। इनमें 7 मामलों में वे प्रत्यक्ष तौर पर नामजद हैं, जबकि 3 मामलों में विवेचना के दौरान उनकी भूमिका सामने आई है। राज्य सरकार का रुख साफ था—“ऐसे मामलों में ढील देना मतलब सार्वजनिक सुरक्षा को खतरे में डालना।”
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए सरकार का सख्त रुख
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित भजनलाल केस और निहारिका इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि गंभीर आरोपों वाली FIR को शुरुआती चरण में रद्द करना न्यायिक सिद्धांतों के विपरीत है। अंततः याची पक्ष FIR रद्द कराने पर जोर नहीं दे पाया और हाईकोर्ट ने उसकी याचिका सख्ती से निस्तारित कर दी।