करीब पांच साल पहले प्रदेश और केंद्र सरकार ने देशभर में सौ शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए चयन किया था, जिनमें बरेली को शामिल किया गया था। योजना घोषित होते ही तमाम अफसरों की लॉटरी निकल आई। वातानुकूलित कमरों में बैठकर कागजों पर लंबे चौड़े प्रोजेक्ट तैयार किए गए। इन्हें कभी सार्वजनिक नहीं किया गया, और न ही किसी जनप्रतिनिध आदि स्मार्ट सिटी बरेली कंपनी में स्थान दिया गया। अफसरों ने अपने चहेते ठेकेदारों को मनमानी दरों पर निर्माण कार्य आदि सौंप दिए। इसके साथ ही अपने लोगों को समायोजित करने के लिए रोजगार दिया। अब स्थिति यह है कि करीब 1000 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद एक भी प्रोजेक्ट जनता के काम नहीं आ रहा है।
मनमानी और लूट खसोट जमकर होने पर वरिष्ठ पार्षद राजेश अग्रवाल ने मोर्चा खोल दिया है। वह पिछले लंबे समय से मनमानी और भ्रष्टाचार के खिलाफ सवाल दागते आ रहे हैं। मगर अभी तक किसी भी प्रोजेक्ट की जांच तक शुरू नहीं हुई है। सड़क चौड़ीकरण में तमाम खंभे शिफ्ट हुए, लेकिन विकास भवन के सामने आज भी यातायात में बाधक बने आधा दर्जन से ज्यादा खंभों का झुरमुट सिस्टम को मुंह चिड़ा रहा है।
स्मार्ट सिटी परिकल्पना जब कागजों पर उतारी गई तब जनता को अलग सपने दिखाए गए थे। सपा नेता राजेश अग्रवाल कहते हैं कि यह सब खेल लूट खसोट करने के लिए ही नियोजित तरीके से किया गया था। कागजों पर प्रोजेक्ट बने और चहेते ठेकेदार को काम भी दे दिया गया। उन्होंने बताया कि अगर स्मार्ट सिटी प्रोजेक्टों पर समीक्षा हो तो सिर्फ महादेव कुतुबखाना पुल ही जनता से जुड़ पाया। बाकी प्रोजेक्ट अभी तक सीधे जनता से नहीं जुड़ पाए। जबकि सभी प्रोजेक्ट जनता के लिए और शहरी विकास के लिए बनाए गए थे। स्वच्छ बरेली सुंदर बरेली नाम भी दिया गया। ऐसे नारे सिर्फ कागजों पर तो दिखे, लेकिन वास्तविक तौर पर कहीं नजर नहीं आ रहे हैं।
टेलीग्राम संवाद से अनौपचारिक बातचीत में राजेश अग्रवाल ने स्मार्ट सिटी पर कई ऐसी बातें बताईं, जिन पर अगर जांच हो तो संबंधित अधिकारी लपेट में आ सकते हैं। उनका कहना है कि एक प्राइवेट संस्था से स्मार्ट सिटी से संबंधित विस्तरित प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कराए गए। संबंधित अफसरों ने डीपीआर बनाने वाली संस्था को मनमाना शुल्क भी दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस संस्था ने स्मार्ट सिटी संबंधी प्रोजेक्ट बनाए थे वो व्यवहारिक थे ही नहीं, इसलिए एक भी प्रोजेक्ट सफल नहीं हो पाया।
उन्होंने बताया कि सबसे हास्यपद बात तो यह है कि जिन लोगों ने पहले प्रोजेक्ट बनाए थे, उन्हीं लोगों को अधिकारियों ने नई संस्था के नाम पर फिर से अनुबंधित कर लिया है। असफल प्रोजेक्ट बनाने वाले लोगों पर होने वाले खर्च भारी भरकम तय कर दिए। उन्होंने बताया कि प्राइवेट संस्था में कार्यरत एक कर्मचारी करीब ढाई लाख रुपये प्रति माह वेतन पर रखा गया। यही कर्मचारी पहले भी था, जिसके प्रोजेक्टों पर सवाल उठते रहे हैं। उनका कहना है कि यह खेल अफसर खेल रहे हैं, जो व्यक्ति सफल प्रोजेक्ट नहीं बना पाया, उसे दौरान अनुबंध पर क्यों रखा गया। ऐसे ही फैसले कई हैं, जिनसे प्रोजेक्ट सफल नहीं हो पाए।
पार्षद राजेश अग्रवाल ने बातचीत में बताया कि अगर हम चर्चित प्रोजेक्ट पर नजर डालते हैं तो संजय कम्युनिटी हॉल परिसर में बना सरोवर, बरेली जंक्शन पर बना तांगा स्टैंड, स्मार्ट शौचालय सोलर ट्री, मल्टी लेवल पार्किंग, लाइट एंड साउंड मनोरंजन सिस्टम, ट्रैफिक लाइटें जैसे कई प्रमुख प्रोजेक्ट धूल फांक रहे हैं। उन्होंने बताया कि सबसे जीता जागता सफेद हाथी पटेल चौक पर बना स्काई वॉक है। स्काई वॉक समेत कई प्रोजेक्ट अधिकारियों ने जनता के सामने ऐसे प्रचारित किए कि शहर विदेशी लुक में नजर आने लगेगा।
शहर में स्थिति यह है कि आधा दर्जन स्थानों पर लगे सोलर ट्री सिस्टम से बैट्रियां, केबल और उपकरण आदि चोरी हो गए। उन्होंने बताया कि सोलर ट्री पर लाखों रुपये खर्च हुए। कमिश्नर और जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में लगाए गए, जिनका लाभ आम जनता को नहीं मिला। शहर चमकाने के नाम पर जगह-जगह सड़कें बनाई गईं, किनारे कीमतीं टाइल्स लगीं, कहीं-कहीं पत्थर भी लगाए गए। मगर वर्तमान समय में सब बदहाल हैं।
शहर में अंधेरा कायम
दिवाली हो या फिर नया साल हर बार शहर में प्रकाश व्यवस्था अस्तव्यस्त ही रही है। स्मार्ट सिटी योजना में फैंसी लाइटें लगाई गईं। आज स्थिति यह है कि कहीं लाइट गायब तो कहीं से खंभा ही गायब है। पार्षद राजेश अग्रवाल बताते हैं कि इंटरनल लाइट लगाने और सड़क सुधार आदि योजना अफसरों ने बनाई। रामपुर बाग, रजिस्ट्री कार्यालय, आवास विकास कॉलोनी और सिविल लाइंस आदि क्षेत्र चयनित किए गए। लाइटिंग व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए अनाप सनाप दामों पर खरीदकर नई लाइटें लगाई गईं। सड़क और नालियां भी बनीं। पुरानी लाइटें और खंभे कहां गए कुछ पता नहीं। इस परियोजना पर 18 करोड़ से अधिक रुपये खर्च हुए, लेकिन फिर भी अंधेरा काम है। उन्होंने बताया इन क्षेत्रों से वह पार्षद भी हैं।
नगर निगम में मनमानी, व्यापारी बेहाल
पार्षद राजेश अग्रवाल कहते हैं कि स्मार्ट सिटी परियोजनाएं भ्रष्टाचार और मनमानी से घिरी होने के कारण बदहाल हैं, लेकिन नगर निगम की सेहत भी कुछ अच्छी नहीं है। उनका कहना है कि नगर निगम अपनी कामर्शियल संपत्तियों पर मनमाना टैक्स वसूल रहा है। इसके अलावा किराए पर दुकान लेकर अपना छोटा मोटा काम करने वाले दुकानदारों का भी आर्थिक शोषण किया जा रहा है। निजी सम्पत्तियों पर कामर्शियल टैक्स मनमाने तरीके से लगाया जा रहा है। कुछ लोग इसे कम कराने का धंधा भी कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके द्वारा यह मामला उठाया गया था।
मेयर डॉ. उमेश गौतम ने इस मुद्दे पर सकारात्मक सहयोग किया, लेकिन नगर निगम सिस्टम की मनमानी से कम अनुपात में लोगों को राहत मिल पाई। स्थिति अब यह है कि तमाम दुकानदारों की दुकानें बकाएदारी के नाम पर सील हो रही हैं। ज्यादातर मामले नियम विरुद्ध हैं। व्यापारी बेहाल हैं। मेयर डॉ. उमेश गौतम इसे सुलझाना चाहते हैं, लेकिन नगर निगम में खराब सिस्टम होने से वह असहाय जैसी स्थिति में हैं।