Friday, January 30, 2026

यह यूपी पुलिस है जनाब... पीड़ित हो या आरोपी फर्क नहीं करती

लेखक: Jagran Today | Category: उत्तर प्रदेश | Published: August 17, 2024

यह यूपी पुलिस है जनाब... पीड़ित हो या आरोपी फर्क नहीं करती
अब चाहे वह रस्सी का सांप बनाना हो या फिर पीड़ित को ही अपराधी बना देना। समझौता कराने में तो यूपी पुलिस माहिर है। समझौता होने के बाद दक्षिणा तो दोनों ही पक्षों को देनी होती है। फिर चाहे वह पीड़ित हो या आरोपी। 
खैर ताजा मामला बरेली के बारादरी थाने से जुड़ा है। 23 मार्च को कटरा चांद खां में रहने वाले ओमप्रकाश मौर्य अपनी बाइक से गुलाबवाड़ी रोड से होते हुए नवादा शेखान की ओर जा रहे थे। रास्ते में तीन लफंगे तेज रफ्तार में बाइक लहराते हुए आए और उनकी बाइक सामने से ठोक दी। ओमप्रकाश उछल कर दूर जा गिरे। उनके सिर और कंधे में गंभीर चोटें आईं। लफंगे उन्हें संभालने के बजाय झटपट अपनी बाइक लेकर रफूचक्कर हो गए। आसपास के लोगों ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया। लफंगे मोहल्ले के ही थे सो उन्होंने एक को पहचान लिया जोकि बाइक चला रहा था। 
एफआईआर लिखाकर मोल ले ली मुसीबत
कुछ दिनों बाद हालत में सुधार होने पर 27 मार्च को ओमप्रकाश घटना की शिकायत दर्ज कराने बरेली के बारादरी थाने पहुंचे। बस यहीं से उनकी पहली गलती शुरू होती है। पुलिस ने उनकी शिकायत पर एक नाबालिग और उसके दो अज्ञात साथियों पर एफआईआर तो दर्ज कर ली मगर कार्रवाई के नाम पर उनका ही उत्पीड़न शुरू कर दिया। करीब एक हफ्ते बाद पुलिस ने मुआयना करने के नाम पर ओमप्रकाश को बाइक समेत थाने बुलाया और जब वह वहां पहुंचे तो नई मुसीबत गले पड़ गई। मुआयना के नाम पर पुलिस ने ओमप्रकाश की बाइक ही जब्त कर ली मगर जो टक्कर मारकर भागे उन्हें नहीं पकड़ा।  अब ओमप्रकाश दोहरी मुसीबत में फंस चुके थे, एक तो वह चोट से उबर नहीं पाए थे और बाइक जाने से पैदल भी हो गए। अब उनके सामने पहली चुनौती बाइक वापस पाने की थी। 
सिपाही बोला- बिना खर्चा-पानी दिए नहीं होता काम
ओमप्रकाश बताते हैं कि लंबे समय तक वह थाने के चक्कर काटते रहे। आखिरकार 11 जुलाई को जब वह थाने पहुंचे और थाना इंचार्ज को प्रार्थना पत्र सौंपा तो उन्होंने बाइक उनकी सुपुर्दगी में देने के लिखित आदेश कर दिए। बड़ी राहत की सांस लेते हुए वह रवन्ना लेकर थाने में कंप्यूटर रूम में बैठे सिपाही के पास पहुंचे मगर उनकी यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं टिकी। पहले तो सिपाही ने कागजी कार्रवाई के नाम पर उन्हें खूब दौड़ाया और जैसे तैसे उन्होंने वह पूरी भी कर दी तो बात खर्चा-पानी पर आकर अटक गई। करीब साढ़े चार घंटे थाने में बैठाने के बाद सिपाही खुलकर बोल पड़ा- जब तक खर्चा-पानी नहीं दोगे बाइक नहीं मिलेगी। ओमप्रकाश ने इंस्पेक्टर की चिट्ठी दिखाई लेकिन सिपाही बोला- इसके कोई मायने नहीं है, यह प्रार्थना पत्र ही गलत है दोबारा लिखो और साहब से आदेश कराकर लाओ। अब ओमप्रकाश के पास एक ही चारा था या तो वह दक्षिणा दे देते या फिर चुपचाप घर लौट आते क्योंकि दूसरे प्रार्थना पत्र पर साइन करने के लिए साहब तो वहां मौजूद नहीं थे। सो उन्होंने एक बार अपनी जेब में हाथ डालकर देखा, जो पहले ही खाली थी। सो उन्होंने घर लौटना ही बेहतर समझा। 

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