सांझी, ब्रज की प्राचीन लोक कलाओं में से एक है। इसका प्रदर्शन फूलों की सांझी, गोबर सांझी, सूखे रंग की सांझी, पानी में सांझी और पानी पर सांझी के रूप में किया जाता है। जानकारों के अनुसार सांझी का अर्थ सज्जा और शृंगार से है। मान्यता है कि इस कला की शुरुआत स्वयं राधारानी ने की थी।
सांझी शब्द दरअसल सांझ से बना है, इसका अर्थ है शाम। ब्रज में सांझी भी शाम को बनाई जाती है। इस कला का ब्रज से बड़ा गहरा नाता है। पितृ पक्ष में सांझी कला को लेकर अनेक देवालयों में विभिन्न आयोजन होते हैं।
उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद की ओर से महावन रमणरेती स्थित महाकवि रसखान और ताज बीबी समाधि परिसर में इस बार सांझी महोत्सव का आयोजन 28 सितंबर से होने जा रहा है। ब्रज तीर्थ विकास परिषद के सीईओ श्याम बहादुर सिंह ने बताया कि महोत्सव का आयोजन 28 सितंबर से 2 अक्तूबर तक होगा। इसका उद्देश्य ब्रज की इस प्राचीन लोककला को देश विदेश तक पहुंचाना है।
उन्होंने बताया कि सांझी महोत्सव के दौरान रसखान समाधि ओपन एयर थियेटर में शाम पांच से सात बजे तक 28 सितंबर को डॉ. मीरा दीक्षित का कथक नृत्य, गोपाल प्रसाद का पद गायन, 29 को बिहारी शरण की भजन संध्या, 30 को मयूर कोशिक का हवेली संगीत, एक अक्टूबर को गीता शोध संस्थान एवं रासलीला अकादमी वृंदावन और श्रीनरहरि सेवा संस्थान द्वारा माखन चोरी लीला और दो अक्तूबर को पूरन प्रकाश के रसखान के पद और ब्रज में सांझी पर व्याख्यान होगा।
इसके साथ ही सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक प्रत्येक दिन कैनवास पर सांझी, सूखे रंगों की सांझी, रंगोली, गोबर सांझी का प्रदर्शन विभिन्न ग्रुप और कलाकारों द्वारा देखने को मिलेगा।