पावर कारपोरेशन में उपभोक्ताओं से नकद रकम लेकर चेक से बिल जमा करने वाले गिरोह पर तहरीर दिए जाने के 15 दिन बाद बरेली कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज की गई, लेकिन एफआईआर में किसी को नामजद नहीं किया गया है। 15 दिन तक जांच के नाम पर एफआईआर दर्ज होने में हीलाहवाली से इस मामले में दोषियों पर कार्रवाई होगी, इस पर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि इस मामले में कैशियर राहुल गुप्ता को निलंबित कर दिया गया था।
पावर कारपोरेशन में चेक के जरिये बिल जमा करके निगम को लाखों का चूना लगाया गया। जिन बिलों में फर्जीवाड़ा किया गया वे विद्युत वितरण खंड ग्रामीण द्वितीय के हैं और इन बिलों को जमा विद्युत वितरण खंड नगरीय द्वितीय में किया गया। बैंक से लेटर आने के बाद मामला खुला तो अफसर इसे दबाने में जुट गए। हालांकि 4 अप्रैल को अधिशासी अभियंता हरीश कुमार की ओर से मामले की तहरीर कोतवाली में दी गई लेकिन तब उस पर रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई। अब 19 अप्रैल को इस मामले में अज्ञात पर रिपोर्ट दर्ज की गई है।
मामला खुलने के बाद से ही गर्दन बचाने में जुटे कर्मचारी
घोटाला उजागर होने के बाद से ही इस मामले में लीपापोती शुरू हो गई थी। कई दिनों बाद अफसरों ने मामले की तहरीर भी इसलिए दी क्योंकि उस दिन पावर कारपोरेशन के चेयरमैन आशीष गोयल बरेली में थे। इसके बाद जांच के नाम पर इस मामले में टालमटोल चलती रही। ग्रामीण खंड द्वितीय के अफसर नगरीय तो नगरीय खंड द्वितीय के अफसर ग्रामीण की ओर से एफआईआर दर्ज कराने की बात कहकर मामले को टाल रहे थे। बाद में अफसरों के दखल पर अधिशासी अभियंता हरीश कुमार की ओर से कोतवाली में तहरीर दी गई।
ऐसे किया बिजली बिल जमा करने में लाखों का खेल
चेक से बिल जमाकर लाखों का घोटाला करने वाले गिरोह के निशाने पर ऐसे उपभोक्ता रहते थे, जिन पर लाखों का बिल बकाया होता था। यह गैंग उपभोक्ताओं से नकद पैसा लेता था फिर किसी अन्य के खाते का चेक लगाकर बिल जमा कर देता है, इसके बाद यह चेक खाते में पैसा न होने कारण बाउंस हो जाते हैं। ऐसे करीब 36 चेक पकड़ में आए थे, इनमें दो चेक ऐसे भी थे, जिन पर साइन तक नहीं थे फिर भी कैशियर ने उन्हें स्वीकार कर लिया थी। कैशियर भी एक बड़े जिम्मेदार के साथ इस खेल में शामिल बताया जा रहा है।
एक अधिशासी अभियंता करीबी है घपलेबाजी करने वाला कर्मचारी
इस खेल में शामिल कर्मचारी एक अधिशासी अभियंता का करीबी बताया जाता है। अधिशासी अभियंता बिजली चोरी की मामलों में राजस्व निर्धारण में भी सुर्खियों में रहे थे। उन्होंने बिना वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति के राजस्व निर्धारण का संशोधन कर दिया था। संशोधन किए गए पत्र 15 दिन बाद बाबू ने डिस्पैच किए थे। यह मामला उछला तो बाबू को यह तर्क देकर बचा लिया गया कि डाक टिकट न होने की वजह से रजिस्ट्री नहीं हो पाई थी। ऐसे में अगर इस मामले में निष्पक्ष जांच हुई तो कर्मचारियों के साथ ही कई अफसर भी चपेटे में आ सकते हैं।