वृंदावन। वृंदावन शोध संस्थान (VRI) द्वारा आयोजित सांझी महोत्सव के सातवें दिन ठा. यशोदानंदन मंदिर में सांझी संवाद का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में रंग एवं जल सांझी प्रस्तुतिकरण, सांझी पद गायन और वृंदावनी उपासना पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ।
श्रीहित विशाल लाल गोस्वामी ने कहा कि सांझी के माध्यम से साधक नित्य लीलाओं में प्रवेश करता है। आचार्य अंबरीष भट्ट गोस्वामी ने बताया कि वृंदावन की "लपेट की सांझी" सबसे प्रसिद्ध है, जिसे दबी-दाबी भी कहा जाता है। उन्होंने सांझी कला में खाकों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
सौरभ गौड़ ने कहा कि सांझी एक विलुप्त होती कला है, जिसका संरक्षण आवश्यक है। अंबुज गोस्वामी ने बताया कि सांझी का पूजन स्वयं श्रीराधिका जी ने श्रीकृष्ण का प्रेम प्राप्ति हेतु किया था। सुधीर शुक्ला, आचार्य सुकृतलाल गोस्वामी और सुमनकांत पालीवाल ने भी अपने विचार रखे।
इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ भुवनेश पाठक एवं पं. राधाकृष्ण ने सांझी पद गायन से किया। अशोक अज्ञ ने "ब्रज सांझी पर आधारित छंद" प्रस्तुत किया और श्यामसुंदर ने शंखनाद किया। ईशान गौड़ और विराट नारायण ने रंग सांझी में निकुंज लीला तथा जल सांझी में कालिया मर्दन लीला का प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम का संचालन एवं समन्वय डॉ. राजेश शर्मा ने किया। इस अवसर पर डॉ. गोविंदलाल गोस्वामी, हिमांशु गौड़, जगदीश गौड़, वासुदेव अग्रवाल, ब्रजराज शरण, कालीचरन सिंह, वीरेंद्र सिंह तोमर, कृष्ण बहादुर अस्थाना, नागराजू, गोपाल शर्मा, गिरधर श्रोत्रिय, डॉ. करूणेश उपाध्याय, उमाशंकर पुरोहित, कृष्णकुमार मिश्रा, शिवम शुक्ला और गोपनंदन झा सहित अनेक विद्वान उपस्थित रहे।