जागरण टुडे बरेली
बहेड़ी। गलियों, चौपालों और घरों की बैठक में अब एक अजीब सी खामोशी पसर गई है। जहां कभी युवाओं की हंसी-मज़ाक, गपशप और बहस गूंजा करती थी, वहां आज मोबाइल की स्क्रीन ने जगह ले ली है।
डॉ.फ़हीम सकलैनी कहते हैं -मोबाइल फोन ने ज्ञान और जानकारी तक पहुंच आसान बनाई है, लेकिन इसके साथ ही युवाओं के सामाजिक रिश्ते कमजोर पड़ते जा रहे हैं। खेल के मैदान सूने हो गए हैं, किताबों की जगह स्क्रॉलिंग ने ले ली है और परिवार के साथ बातचीत महज़ कुछ मिनटों तक सिमटकर रह गई है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह लत युवाओं को असली जीवन के अनुभवों से दूर कर रही है। दोस्ती अब ‘चैट बॉक्स’ में सिमट गई है, जबकि गहरी बातचीत की जगह इमोज़ी और लाइक्स ने ले ली है।
जरूरत इस बात की है कि मोबाइल को ज्ञान और प्रगति का साधन बनाया जाए, न कि जीवन पर हावी होने वाली बेड़ियां। परिवार, समाज और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर युवाओं को जागरूक करना होगा कि असली दुनिया सिर्फ स्क्रीन पर नहीं, बल्कि हमारे आसपास भी सांस लेती है।
अगर समय रहते संतुलन नहीं साधा गया, तो आने वाली पीढ़ी संवाद और जुड़ाव की असली कला भूल जाएगी।