जागरण टुडे, कासगंज।
पारदर्शिता और जन अधिकारों के प्रतीक माने जाने वाले सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) की गंभीर अनदेखी का मामला कासगंज में सामने आया है। 71 वर्षीय समाजसेवी और वरिष्ठ लेखक अशोक कुमार पांडेय बीते 11 महीनों से अपनी RTI आवेदन का जवाब पाने के लिए विभागों के चक्कर काट रहे हैं। परंतु अब तक न प्रशासन ने जवाब दिया और न ही चकबंदी विभाग ने मांगी गई जानकारी प्रदान की।
अशोक पांडेय ने चकबंदी अधिकारी, कासगंज से RTI के तहत ग्राम सभा शाहपुर माफी (बहादुर नगर) और श्यामसर में चकबंदी प्रक्रिया के दौरान प्रति हजार कृषि भूमि पर की गई मानक कटौती प्रतिशत की जानकारी मांगी थी। लेकिन 11 माह बीतने के बावजूद विभाग से कोई उत्तर नहीं मिला।
जब उन्होंने प्रथम अपील जिलाधिकारी कासगंज के पास की, तो डीएम कार्यालय ने चकबंदी अधिकारी को 9 पत्र भेजे, फिर भी विभाग ने कोई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई।
चकबंदी अधिकारी का हालिया जवाब और भी चौंकाने वाला है —
> “हमारे यहां ग्राम बहादुर नगर का कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है।”
इस बयान ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर एक सरकारी विभाग बिना अभिलेखों के कैसे कार्य कर सकता है? अगर रिकॉर्ड मौजूद नहीं हैं, तो यह गंभीर लापरवाही या भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।
अशोक कुमार पांडेय का आरोप
> “जब जिलाधिकारी तक के नौ पत्रों का पालन नहीं हुआ, तो साफ है कि फाइलों में कुछ ऐसा है जिसे छिपाया जा रहा है। RTI कानून को मजाक बना दिया गया है।”
30दिन के अंदर जानकारी देने का है प्रावधान
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अनुसार किसी भी आवेदन का उत्तर 30 दिनों के भीतर देना अनिवार्य है। यह मामला 11 महीने से लंबित है, जो कानून की खुली अवहेलना और प्रशासनिक गैर-जिम्मेदारी का स्पष्ट उदाहरण है।
मामले पर उठ रहे सवाल
यह घटना न सिर्फ RTI कानून की साख पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि आम नागरिक की जानकारी पाने की आजादी कितनी बाधित है। यदि एक वरिष्ठ नागरिक और लेखक को इस तरह गुमराह किया जा सकता है, तो आम जनता के अधिकारों की स्थिति का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।