ढाका, एजेंसी। बांगलादेश के विशेष न्यायाधिकरण ने अपदस्त पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवता के खिलाफ अपराध के लिए मौत की सजा सुनाई है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण (आईसीटी) ने जुलाई 2024 ने प्रदर्शनकारी छात्रों की हत्या के मामले में शेख हसीना की गैर मौजूदगी में यह सजा सुनाई है। अदालत ने उनके सहयोगी पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल को भी फांसी की सजा सुनाई है, जबकि तीसरे आरोपी पूर्व आईजीपी अब्दुल्ला अल ममून को पांच साल जेल की सुनाई है। मगर भारत शेख हशीना को बांगलादेश को नहीं सौंपेगा। भारत हमेशा अपने मित्रों के लिए जोखिम उठाता रहा है। बांगलादेश सरकार के दिसंबर, 2024 में हसीना को सौंपे जाने की मांग के बावजूद भारत उन्हें सुरक्षित रखे हुए है।
बांगलादेश में पिछले साल 5 अगस्त को हुआ था विरोध प्रदर्शन
शेख हसीना पिछले साल 5 अगस्त को बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शन और हिंसा के बाद बांग्लादेश से स्वनिर्वासन के बाद से भारत में रह रही है। अदालत ने उन्हें भगोड़ा घोषित किया था। असदुज्जमा खान ने भी भारत में शरण ले रखी है। छात्र आंदोलन को क्रूरता से कुचलने के मामले में महीनों चली सुनवाई के बाद आए फैसले को मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने ऐतिहासिक बताया है। साथ ही भारत से हसीना और असदुज्जमा खान को तत्काल बांग्लादेश को प्रत्यर्पित करने का आग्रह किया है। हालांकि शेख हसीना ने आरोपों को गलत और मनगढ़ंत बताया है।
विशेष न्यायाधिकरण ने मुख्य साजिशकर्ता माना
बांग्लादेश के विशेष न्यायाधिकरण ने फैसले में आवामी लीग नेता शेख हसीना को सैकड़ों प्रदर्शनकारियों की जान लेने वाले हिंसक दमन का मास्टरमाइंड और मुख्य साजिशकर्ता माना है। कोर्ट ने इस मामले में पांच आरोपों पर सुनवाई की। इसमें हत्याओं का आदेश देना, भड़काऊ भाषण देकर हिंसा फैलाना, न्याय बाधित करने के लिए सबूत मिटाने की कोशिश करना, छात्र अबू सईद की हत्या का आदेश देना, पांच लोगों की हत्या के बाद उनकी लाशें जलवाना शामिल है। न्यायाधिकरण ने हत्याओं के आदेश देने और भड़काऊ भाषण देकर हिंसा फैलाने में शेख हसीना को फांसी की सजा सुनाई है।
सोमवार को विशेष न्यायाधिकरण का फैसला आने के बाद भारत सरकार ने जो बयान जारी किया, उसमें इस मसले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। खास बात यह है कि न्यायाधिकरण का फैसला एकतरफा है, इसमें हसीना को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया है। यह मामला आपराधिक से ज्यादा राजनीतिक है, यही आधार है जो प्रत्यर्पण न करने के भारत के पक्ष को मजबूत बनाता है।
भारत-बांग्लादेश के बीच 2013 में हुई थी प्रत्यर्पण संधि
भारत-बांग्लादेश ने 2013 में प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इसी के आधार पर ही बांग्लादेश हसीना को सौंपने की मांग कर रहा है। इसमें 2016 में संशोधन हुआ था। इसी संधि के तहत भारत ने 2020 में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के दो दोषियों को बांग्लादेश भेजा था। संधि में दोनों देशों के बीच अपराधियों के आदान-प्रदान की शर्तें शामिल हैं। पर किसी अपराधी का प्रत्यर्पण तभी किया जाएगा, जब अपराध दोनों देशों में अपराध माना जाए। न्यूनतम एक वर्ष की सजा दी गई हो और आरोपी के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट हो।
इन कारणों से नहीं हो सकता प्रत्यर्पण
राजनीतिक अपराध का प्रावधान: संधि के अनुच्छेद 6 के अनुसार, यदि अपराध राजनीतिक माना जाता है, तो भारत प्रत्यर्पण से इन्कार कर सकता है। हालांकि, हत्या, नरसंहार, मानवता के विरुद्ध अपराध इस धारा से बाहर हैं। आईसीटी ने शेख हसीना को इन गंभीर आरोपों में दोषी पाया है। इसलिए, भारत यह नहीं कह सकता कि पूरा मामला राजनीतिक है।
निष्पक्ष सुनवाई का अभाव: संधि के अनुच्छेद-8 के तहत यदि अभियुक्त की जान को खतरा है, निष्पक्ष सुनवाई नहीं होती, या न्यायाधिकरण का उद्देश्य न्याय नहीं बल्कि राजनीतिक है, तो भारत प्रत्यर्पण से इन्कार कर सकता है। भारत यह सब आसानी से साबित कर सकता है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र पहले ही न्यायाधिकरण के गठन, न्यायाधीशों की नियुक्ति और प्रक्रियाओं पर सवाल उठा चुका है। शेख हसीना को अपना पक्ष रखने के लिए वकील नहीं मिला। कई रिपोर्टें बताती हैं कि न्यायाधीशों पर सरकार का दबाव था।