जागरण टुडे, कासगंज।
जनपद में इस वर्ष लगभग एक लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में गेहूं की बोआई की गई है और वर्तमान में फसल की स्थिति संतोषजनक है। किसान प्रथम सिंचाई के बाद दानेदार यूरिया का छिड़काव कर रहे हैं, किंतु फसल में बेहतर वृद्धि, रोग प्रतिरोधक क्षमता तथा उच्च गुणवत्ता प्राप्त करने के लिए उर्वरकों का संतुलित एवं विवेकपूर्ण उपयोग अत्यंत आवश्यक है। इसी क्रम में जिला कृषि अधिकारी ने किसानों को नैनो यूरिया के वैज्ञानिक उपयोग के संबंध में महत्वपूर्ण सुझाव जारी किए हैं।
जिला कृषि अधिकारी डा, देवेंद्र मिश्रा ने बताया कि गेहूं की द्वितीय सिंचाई के उपरांत यदि पारंपरिक दानेदार यूरिया के स्थान पर नैनो यूरिया का पर्णीय छिड़काव किया जाए तो यह पौधों में नाइट्रोजन तत्व को लंबे समय तक उपलब्ध कराता है। नैनो कणों का अत्यंत सूक्ष्म आकार होने के कारण इसकी अवशोषण क्षमता दानेदार यूरिया की तुलना में कई गुना अधिक होती है, जिससे पौधों में संतुलित बढ़वार होती है और कीट व रोग लगने की संभावना कम हो जाती है।
उन्होंने बताया कि नैनो यूरिया के नियमित व संतुलित प्रयोग से न केवल उपज में वृद्धि होती है बल्कि उत्पाद की गुणवत्ता भी बेहतर होती है। इसके साथ ही फसल के गिरने की समस्या कम होती है तथा जल और पर्यावरण प्रदूषण में भी कमी आती है। मिट्टी के स्वास्थ्य के संरक्षण में भी यह काफी लाभकारी सिद्ध होता है।
नैनो यूरिया की 500 मिलीलीटर मात्रा एक एकड़ क्षेत्र के लिए पर्याप्त है। गेहूं की फसल में इसके छिड़काव हेतु 4 मिलीलीटर नैनो यूरिया प्रति लीटर पानी में मिलाकर पर्णीय छिड़काव करने की सलाह दी गई है। यह सभी प्रकार की फसलों में उपयोगी है।
अधिकारी ने यह भी बताया कि यदि प्रथम सिंचाई के बाद गेहूं की फसल पीली पड़ने लगे तो नैनो यूरिया के साथ एक यूनिट नैनो जिंक या फिर जिंक सल्फेट मोनोहाइड्रेट 6 किलोग्राम प्रति एकड़ का पर्णीय छिड़काव करना चाहिए, जिससे पौधे जल्दी हरे-भरे होकर सामान्य वृद्धि देने लगते हैं।
जिला कृषि अधिकारी ने किसानों से अपील की है कि वे नवीन तकनीक आधारित नैनो उर्वरकों का उपयोग कर कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त करें और स्वस्थ खेती को बढ़ावा दें।