किडनी ट्रांसप्लांट एंड-स्टेज रीनल डिज़ीज़ (ESRD) से जूझ रहे मरीजों के लिए गोल्ड-स्टैंडर्ड इलाज माना जाता है। यह लंबे समय तक चलने वाली डायलिसिस की तुलना में बेहतर सर्वाइवल, बेहतर क्वालिटी ऑफ लाइफ और लॉन्ग-टर्म में अधिक कॉस्ट-इफेक्टिव विकल्प है। जब खराब हो चुकी किडनी की जगह किसी जीवित या मृत दाता की स्वस्थ किडनी लगाई जाती है, तो शरीर का फिज़ियोलॉजिकल बैलेंस दोबारा स्थापित होता है और मरीज फिर से आत्मनिर्भर व सक्रिय जीवन जी पाता है।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, नोएडा के यूरोलॉजी, यूरो-ऑन्कोलॉजी, रोबोटिक यूरोलॉजी विभाग के सीनियर डायरेक्टर एवं किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी विभाग के हेड डॉ. अमित के. देवरा ने बताया “वे मरीज जिनकी किडनियां स्थायी रूप से फ्लूइड बैलेंस, इलेक्ट्रोलाइट्स और मेटाबॉलिक फंक्शन बनाए रखने में असमर्थ हो जाती हैं, किडनी ट्रांसप्लांट के उपयुक्त उम्मीदवार होते हैं। डायबिटिक नेफ्रोपैथी, हाई ब्लड प्रेशर से जुड़ी किडनी बीमारी, क्रॉनिक ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस और जेनेटिक रीनल डिसऑर्डर इसके प्रमुख कारण हैं। ट्रांसप्लांट से पहले की विस्तृत मेडिकल जांच से मरीज की फिटनेस सुनिश्चित की जाती है, जिससे सर्जरी के जोखिम कम होते हैं और बेहतर नतीजे मिलते हैं।“
ट्रांसप्लांट सर्जरी में डोनर किडनी को मरीज के इलिएक फोसा में प्रत्यारोपित किया जाता है, जहां ब्लड वेसल्स और यूरिनरी ट्रैक्ट को अत्यंत सावधानी से जोड़ा जाता है। सर्जरी के बाद की देखभाल भी उतनी ही अहम होती है। रिजेक्शन से बचाव के लिए मरीज को जीवनभर इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं लेनी होती हैं, साथ ही इन्फेक्शन, मेटाबॉलिक कॉम्प्लिकेशंस और ग्राफ्ट फंक्शन की नियमित मॉनिटरिंग की जाती है। आधुनिक प्रोटोकॉल के चलते आज अधिकांश सेंटर्स में एक साल बाद ग्राफ्ट सर्वाइवल 95% से अधिक है।
डॉ. अमित ने आगे बताया “भारत में किडनी ट्रांसप्लांट की मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर है। इस गैप को कम करने के लिए कंट्रोल्ड हाईपरटेंशन या डायबिटीज़ वाले मेडिकली फिट डोनर्स, ठीक हो चुके किडनी स्टोन वाले डोनर्स, पेयर्ड किडनी एक्सचेंज (स्वैप ट्रांसप्लांट) और ब्लड ग्रुप मिसमैच मामलों में डिसेंसिटाइजेशन जैसी रणनीतियों को अपनाया जा रहा है। इन उपायों से डोनर की सुरक्षा बनाए रखते हुए वेटिंग लिस्ट में होने वाली मृत्यु दर कम की जा सकती है और ट्रांसप्लांट के नतीजे बेहतर होते हैं। इसके साथ ही डीसिज़्ड डोनर प्रोग्राम्स को मजबूत करने और जन-जागरूकता बढ़ाने की भी तत्काल आवश्यकता है।“
आधुनिक ट्रांसप्लांट मेडिसिन अब सीमित डोनर क्राइटेरिया से आगे बढ़ चुकी है। सख्त मेडिकल जांच और नियमित फॉलो-अप के साथ, कंट्रोल्ड मेडिकल कंडीशंस वाले डोनर्स भी सुरक्षित रूप से दान कर सकते हैं। स्वैप ट्रांसप्लांट प्रोग्राम्स से ऐसे डोनर-रिसीपिएंट जोड़े, जिनमें ब्लड ग्रुप या इम्यूनोलॉजिकल मिसमैच होता है, अन्य समान परिस्थितियों वाले जोड़ों से किडनी एक्सचेंज कर पाते हैं। इससे एथिकल और मेडिकल स्टैंडर्ड्स से समझौता किए बिना वेटिंग टाइम काफी कम हो जाता है।
आगे की राह में इम्यूनोलॉजी, प्रिसीजन मेडिसिन और सर्जिकल टेक्निक्स में हो रही प्रगति किडनी ट्रांसप्लांट को और सुरक्षित व प्रभावी बना रही है। भविष्य की सफलता समान पहुंच, मजबूत डोनर रजिस्ट्रियों और पब्लिक हेल्थ पॉलिसी व क्लिनिकल एक्सीलेंस के बेहतर समन्वय पर निर्भर करेगी। सही जानकारी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ, किडनी ट्रांसप्लांट केवल जीवन बचाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन को दोबारा संवारने का सशक्त माध्यम है।