याज्ञवल्क्य और गामा मारीच की भूमिका से शुरू हुआ सफर, अब फैक्ट्री स्टेट रामलीला में मंचन कोऑर्डिनेटर की संभाल रहे जिम्मेदारी
धर्म और आस्था की सीमाओं से ऊपर उठकर कला और संस्कृति लोगों को जोड़ने का काम करती है। शाहजहांपुर की फैक्ट्री स्टेट श्रीरामलीला इसका उदाहरण है। यहां ईसाई धर्म से जुड़े पैट्रिक दास पिछले 35 वर्षों से प्रभु श्रीराम की लीला में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। अभिनय से शुरू हुआ उनका सफर अब मंचन कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी तक पहुंच चुका है। उनका योगदान सांप्रदायिक सौहार्द और कौमी एकता की ऐसी मिसाल है, जो आपसी भाईचारे का संदेश देता है।
पैट्रिक दास वर्ष 1991 में याज्ञवल्क्य और गामा मारीच की भूमिका निभाकर रामलीला मंचन से जुड़े थे। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अलग-अलग किरदारों को जीवंत करने के साथ उन्होंने निर्देशन और आयोजन की जिम्मेदारियां भी संभालीं। आज भी सेवानिवृत्ति के बाद उनका रामलीला से जुड़ाव बरकरार है।
प्रदर्शनी में स्टाल लगाने से जागी रामलीला में अभिनय की इच्छा
पैट्रिक दास की सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ने की शुरुआत वर्ष 1985 में आयुध वस्त्र निर्माणी में नियुक्ति के बाद हुई। वह दुर्गा पूजा के दौरान आयोजित नाटकों और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। वर्ष 1990 में दोस्तों के साथ रामलीला प्रदर्शनी में पेप्सी का स्टाल लगाने पहुंचे तो उनके मन में रामलीला के मंच पर अभिनय करने की इच्छा जागी।
स्वर्गीय बालकिशन के सहयोग से उन्हें पहली बार मंच पर अभिनय करने का अवसर मिला। इसके बाद महेश सक्सेना के मार्गदर्शन में उन्होंने विभीषण की भूमिका निभाई। इस किरदार को प्रभावशाली बनाने के लिए उन्होंने तुलसीकृत रामायण और राधेश्याम रामायण का अध्ययन किया। साथ ही भक्ति गीतों को अपने अभिनय का हिस्सा बनाकर भूमिका को विशेष रूप दिया। उनके अभिनय को दर्शकों की सराहना मिली और उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनय का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
दशरथ, मेघनाद और रावण के किरदारों से बनाई पहचान
रामलीला में अपने लंबे सफर के दौरान पैट्रिक दास ने कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। दशरथ, मेघनाद और रावण जैसे किरदारों के जरिए उन्होंने अपनी अभिनय प्रतिभा का परिचय दिया। अभिनय के साथ-साथ उन्होंने लगभग दस वर्षों तक निर्देशक के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई। मंचन की बारीकियों और पात्रों की प्रस्तुतियों को लेकर उनके अनुभव ने रामलीला आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वर्षों तक मंच से जुड़े रहने के बाद अब वह मंचन कोऑर्डिनेटर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उनके लिए रामलीला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक एकता से जुड़ने का माध्यम भी है।
कौमी एकता सम्मान से हो चुके हैं सम्मानित
पैट्रिक दास के योगदान को वर्ष 2015 में विशेष पहचान मिली। विकास भवन में आयोजित कौमी एकता दिवस के अवसर पर उन्हें कौमी एकता सम्मान से सम्मानित किया गया। वह शाहजहांपुर के कैथोलिक समाज और शाहजहांपुर वेटरन क्रिकेट के उपाध्यक्ष भी हैं।
सितंबर 2024 में आयुध वस्त्र निर्माणी से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उन्होंने रामलीला से अपना नाता नहीं तोड़ा। आज भी वह आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं और अपने अनुभव के जरिए मंचन से जुड़े लोगों का सहयोग करते हैं।
कला और संस्कृति जोड़ती हैं लोगों को
पैट्रिक दास का मानना है कि धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन कला, संस्कृति और आपसी भाईचारा सभी को जोड़ते हैं। उनके अनुसार, किसी भी समाज की मजबूती आपसी सम्मान और सहयोग से बनती है। फैक्ट्री स्टेट श्रीरामलीला में विभिन्न धर्मों के लोगों का मिलकर आयोजन को सफल बनाना इसी भावना को दर्शाता है।
पैट्रिक दास का 35 वर्षों का सफर बताता है कि सांस्कृतिक विरासत किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं होती। जब लोग आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर साझा परंपराओं के लिए साथ आते हैं, तो सामाजिक सौहार्द की मजबूत मिसाल कायम होती है।