सुमित विजयवर्गीय, कासगंज। गोरक्षा के नाम पर बेगुनाहों का खून बहाने के किस्से तो बहुत सुनने में आते हैं मगर असली गोप्रेम क्या होता है यह कासगंज के गांव धर्मपुर में देखने को मिला। जहां एक गाय की मृत्यु पर पूरा गांव रोने लगा। इसके बाद बकायदा शवयात्रा निकालकर गाय का अंतिम संस्कार किया गया और इसमें पूरा गांव शामिल हुआ।
गंजडुंडवारा क्षेत्र के गांव धर्मपुर में प्राचीन शिव मंदिर है। गांव के निकेश सिंह ने बताया कि लगभग चार साल पहले एक गाय कहीं से मंदिर में आ गई थी। वह तीन मंजिला मंदिर में ऊपर चढ़ गई। दो दिन तक वह वहीं रही फिर अपने आप नीचे उतर आई, तब से ही गाय मंदिर प्रांगण में रह रही थी।
गाय रोजाना नियमित रूप से गांव के सभी घरों पर जाती थी। लोग उसे खाने को रोटी दे देते थे, जिसे खाने के बाद वह चली जाती थी। यह उसका दिन में दो बार का नियम था। इसके बाद वह वापस मंदिर में चली जाती थी और वहीं रहती थी।
निकेश सिंह बताते हैं कि गाय का स्वभाव बेहद शांत था। बच्चा हो या बुजुर्ग उसने कभी किसी पर हमला नहीं किया। वह सभी से प्रेम करती थी। उसके इसी स्वभाव की वजह से ग्रामीणों का उसके प्रति लगाव बढ़ता गया। शनिवार को गाय अचानक बीमार हो गई। ग्रामीणों ने चिकित्सक को बुलाकर इलाज कराया लेकिन उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ। रविवार को गाय की मृत्यु हो गई।
मौत की खबर मिलते ही गांव में दौड़ी शोक की लहर
गाय की मौत की खबर जैसे ही गांव में फैली लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। जिसे भी इस बारे में पता चला उसकी आंख नम हो गई। गांववाले दौड़े-दौड़े मौके पर पहुंचे। कुछ ही देर में तमाम ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई। नम आखों से ग्रामीणों ने तय किया कि गाय का ससम्मान अंतिम संस्कार किया जाए। इसके बाद आपसी सहयोग से क्रियाक्रम की तैयारी की गई। शवयात्रा निकालने के लिए ट्रैक्टर ट्रॉली को सजाया गया, जिस पर गाय का शव रखकर कादरगंज गंगाघाट तक ले जाया गया।
अंतिम यात्रा में 250 से ज्यादा ग्रामीण हुए शामिल
गाय की शवयात्रा ट्रैक्टर ट्रॉली पर निकाली गई, जिसमें 250 से ज्यादा ग्रामीण शामिल हुए। मगर इससे पहले ट्रैक्टर ट्रॉली को सजाया गया और फिर उस पर गाय का शव रखकर 11 किलोमीटर तक पैदल ग्रामीण बदायूं के कादरगंज गंगाघाट पहुंचे जहां गाय का अंतिम संस्कार किया गया।
विधिविधान से किया गया अंतिम संस्कार
गाय का अंतिम संस्कार पूरे विधिविधान से किया गया। अंतिम संस्कार की सारी रस्में ग्रामीणों ने खुद ही पूरी कीं। इसके बाद गंगाघाट पर गड्ढा खोदकर गाय का शव दफन किया गया। ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से अंतिम संस्कार का पूरा खर्च उठाया।