जागरण टुडे, कासगंज(उदित विजयवर्गीय)
साइबर अपराध का तरीका अब तेजी से बदल रहा है। पहले जहां ठग फर्जी लिंक, कॉल या तकनीकी हैकिंग के जरिए लोगों को निशाना बनाते थे, वहीं अब वे इंसान के सबसे बड़े कमजोर पक्ष—डर—को हथियार बना चुके हैं। कानून, जेल, जांच एजेंसियों और आतंकी फंडिंग जैसे गंभीर आरोपों का खौफ दिखाकर आम लोगों को मानसिक रूप से तोड़ा जा रहा है और इसी दबाव में उनसे लाखों रुपये ऐंठ लिए जा रहे हैं।
वही ताजा गंजडुंडवारा कस्बे से जुड़े मामले के सामने आने पर, इस नए ट्रेंड की गंभीरता को उजागर कर दिया है। क्यों कि यहां साइबर ठगों ने विगत 7 दिनों के भीतर एक बुजुर्ग को ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाकर कस्बा के मोहल्ला खेरु निवासी स्वालेह अंसारी 31 लाख रुपये की ठगी कर ली गई। ठगों ने खुद को जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर पीड़ित को विश्वास मे लिया और फिर धीरे-धीरे उसे मानसिक रूप से इतना डरा दिया कि वह उनकी हर बात मानने को मजबूर हो गया। वैसे अब यह मामला जनपद भर मे चर्चा का विषय बना हुआ है।
आपको बता दे इस तरह की ठगी में तकनीक से ज्यादा मनोवैज्ञानिक खेल खेला जाता है। ठग पहले पीड़ित को किसी गंभीर अपराध—जैसे मनी लॉन्ड्रिंग या आतंकी फंडिंग—में फंसने का डर दिखाते हैं। इसके बाद वे लगातार फोन या वीडियो कॉल के जरिए उसे “निगरानी” में रखते हैं, जिससे पीड़ित खुद को सचमुच किसी जांच के घेरे में महसूस करने लगता है। परिवार या परिचितों से बात न करने की हिदायत देकर उसे पूरी तरह अलग-थलग कर दिया जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक तरह का “मानसिक जाल” होता है, जिसमें व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी निर्णय लेने की क्षमता खो देता है। डर, शर्म और गिरफ्तारी के खौफ के कारण वह बिना जांच-पड़ताल किए ठगों के निर्देशों का पालन करने लगता है। यही कारण है कि पढ़े-लिखे और समझदार लोग भी इस तरह की ठगी का शिकार हो रहे हैं।
गंजडुंडवारा की घटना ने साफ कर दिया है कि साइबर अपराध अब केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक युद्ध का रूप ले चुका है। ठगों का लक्ष्य अब लोगों के दिमाग और भावनाओं पर नियंत्रण करना है, जिससे वे बिना किसी प्रतिरोध के उनकी बात मान लें।
सावधानी ही बचाव: क्या करें- क्या ना करें
इस तरह के मामलों में सबसे जरूरी है सतर्क रहना और डर के दबाव में कोई भी फैसला न लेना। विशेषज्ञों का कहना है कि कोई भी सरकारी एजेंसी कभी फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी या जांच की धमकी नहीं देती और ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया होती ही नहीं, यह केवल ठगों द्वारा रचा गया जाल है। ऐसे में यदि कोई अनजान व्यक्ति इस तरह का डर दिखाए तो तुरंत घबराने के बजाय शांत रहकर स्थिति को समझना चाहिए। किसी भी तरह के दबाव में आकर पैसे ट्रांसफर करना सबसे बड़ी गलती साबित हो सकता है।
इसके साथ ही, ऐसी स्थिति में खुद को अकेला न करें बल्कि तुरंत अपने परिवार या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें, क्योंकि ठग अक्सर पीड़ित को अलग-थलग कर मानसिक रूप से कमजोर करने की कोशिश करते हैं। किसी भी अनजान कॉल पर अपनी बैंक डिटेल, OTP या निजी जानकारी साझा नहीं करनी चाहिए और यदि मामला संदिग्ध लगे तो संबंधित एजेंसी के आधिकारिक नंबर या वेबसाइट से इसकी पुष्टि करना जरूरी है।
अगर किसी के साथ इस तरह की ठगी हो जाए तो बिना देर किए साइबर हेल्पलाइन 1930 या ऑनलाइन पोर्टल पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए, ताकि समय रहते कार्रवाई हो सके और नुकसान को कम किया जा सके। यह घटना एक चेतावनी है कि अब ठगी केवल तकनीक से नहीं, बल्कि डर के सहारे की जा रही है, इसलिए जागरूकता और संयम ही इस नए खतरे से बचने का सबसे बड़ा हथियार है।