Thursday, April 16, 2026

KASGANJ NEWS बेटे ने ठुकराया सहारा, वृद्धाश्रम बना अंतिम सहारा: चंद्र प्रकाश की मौत के बाद संस्था निभाएगी सभी रस्में, 27 अप्रैल को शांतिपाठ

लेखक: Guddu Yadav | Category: उत्तर प्रदेश | Published: April 16, 2026

KASGANJ NEWS बेटे ने ठुकराया सहारा, वृद्धाश्रम बना अंतिम सहारा: चंद्र प्रकाश की मौत के बाद संस्था निभाएगी सभी रस्में, 27 अप्रैल को शांतिपाठ

जागरण टुडे, गुड्डू यादव, कासगंज

जिस बेटे को सहारा मानकर 70 वर्षीय चंद्र प्रकाश और उनकी 74 वर्षीय पत्नी धनदेवी ने जीवन बिताया, उसी बेटे ने बुढ़ापे में उनका साथ छोड़ दिया। हालात ऐसे बने कि दोनों को अपने ही घर से बेघर होकर वृद्धाश्रम में शरण लेनी पड़ी। जीवन की इस पीड़ा भरी कहानी का अंत भी उतना ही मार्मिक रहा, जब 14 अप्रैल की शाम चंद्र प्रकाश ने वृद्धाश्रम में अंतिम सांस ली।

चंद्र प्रकाश लंबे समय से बीमार चल रहे थे और उनका इलाज भी जारी था। आर्थिक तंगी और पारिवारिक उपेक्षा ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया था। दंपती के नाम ततारपुर स्थित कांशीराम आवासीय कॉलोनी में मकान आवंटित था, लेकिन वहां उनका बेटा रहता है। बताया जाता है कि बेटा न तो आर्थिक रूप से सक्षम है और न ही किसी स्थायी रोजगार में है। इसी बीच 30 मार्च को बेटे ने दोनों बुजुर्गों को घर से बाहर कर दिया, जिसके बाद वे वृद्धाश्रम में रहने लगे।

वृद्धाश्रम में ही चंद्र प्रकाश की हालत बिगड़ती गई और आखिरकार 14 अप्रैल को उन्होंने दम तोड़ दिया। सबसे दुखद पहलू यह रहा कि बेटे ने पिता के शव को लेने से भी इंकार कर दिया। ऐसे में वृद्धाश्रम में रह रहे सचिन गौतम ने इंसानियत का परिचय देते हुए चंद्र प्रकाश के शव को मुखाग्नि दी।

पति की मौत के बाद धनदेवी का रो-रोकर बुरा हाल है। जीवनभर साथ निभाने वाला साथी जब इस तरह चला गया और अपने ही बेटे ने मुंह मोड़ लिया, तो उनका दर्द शब्दों में बयां करना मुश्किल है। इस कठिन घड़ी में वृद्धाश्रम के लोगों ने ही परिवार की भूमिका निभाई।

वृद्धाश्रम के संचालक सोनू ने बताया कि चंद्र प्रकाश संस्था के जिम्मेदार और मिलनसार सदस्य थे। उन्होंने कहा कि अंतिम संस्कार के बाद होने वाली सभी परंपराएं और रस्में भी आश्रम द्वारा ही पूरी की जाएंगी। इसी क्रम में 27 अप्रैल को शांतिपाठ यज्ञ का आयोजन किया जाएगा, जिसमें संस्था के सदस्य और स्थानीय लोग शामिल होकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करेंगे।

यह घटना समाज को सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर बुजुर्गों के प्रति हमारी जिम्मेदारी कहां खोती जा रही है।

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