हेपेटाइटिस यानी लिवर में सूजन एक आम लेकिन अक्सर देर से पहचानी जाने वाली बीमारी है, क्योंकि लिवर लंबे समय तक नुकसान को छुपाकर काम करता रहता है। इसी वजह से बीमारी का पता तब चलता है जब स्थिति काफी बिगड़ चुकी होती है। यह दो प्रकार का होता है। एक एक्यूट और दूसरा क्रॉनिक। दोनों के लक्षण व प्रभाव अलग-अलग होते हैं।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, नोएडा के मेडिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के सीनियर डायरेक्टर डॉ. संजय कुमार ने बताया “एक्यूट हेपेटाइटिस आमतौर पर वायरल संक्रमण (खासकर हेपेटाइटिस A और E) दवाओं, ऑटोइम्यून बीमारियों या मेटाबॉलिक डिसऑर्डर जैसे विल्सन डिजीज के कारण होता है। इसके शुरुआती लक्षणों में मितली, उल्टी, भूख न लगना, बुखार, थकान और पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द शामिल हैं, जिसके बाद पीलिया, गहरे रंग का पेशाब, हल्के रंग का मल और खुजली जैसे लक्षण दिखते हैं।
ज्यादातर मरीज 6–8 हफ्तों में ठीक हो जाते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह गंभीर होकर एक्यूट लिवर फेलियर में बदल सकता है, जो जानलेवा स्थिति होती है और कई बार लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। इसका इलाज मुख्यतः सपोर्टिव होता है, जिसमें शरीर की स्थिरता बनाए रखना और जटिलताओं से बचाव करना शामिल है।
क्रॉनिक हेपेटाइटिस 6 महीने से अधिक समय तक रहने वाली लिवर की सूजन है, जो शराब के अत्यधिक सेवन, फैटी लिवर, हेपेटाइटिस B और C जैसे वायरल संक्रमण, ऑटोइम्यून और जेनेटिक कारणों से हो सकता है। शुरुआत में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं या नजर नहीं आते, लेकिन समय के साथ यह सिरोसिस जैसी गंभीर स्थिति में बदल सकता है। इसके कारण पेट में पानी भरना, खून बहना, बार-बार संक्रमण, दिमाग पर असर, किडनी की समस्या और लिवर कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
डॉ. संजय ने आगे बताया ”क्रॉनिक लिवर डिजीज का इलाज उसके कारण के अनुसार किया जाता है। जैसे शराब से जुड़े मामलों में पूरी तरह परहेज, फैटी लिवर में लाइफस्टाइल बदलाव और वजन कम करना, वायरल हेपेटाइटिस में एंटीवायरल दवाएं, विल्सन डिजीज में कॉपर कंट्रोल थेरेपी और हीमोक्रोमैटोसिस में ब्लड रिमूवल थेरेपी।
गंभीर स्थिति में लिवर ट्रांसप्लांट ही अंतिम विकल्प रह जाता है। हेपेटाइटिस से बचाव सबसे प्रभावी तरीका है। इसके लिए साफ खाना और पानी लेना, हेपेटाइटिस B का टीकाकरण, असुरक्षित यौन संबंधों और इंजेक्शन ड्रग्स से बचाव, मेडिकल और कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं में साफ उपकरणों का इस्तेमाल और व्यक्तिगत सामान जैसे टूथब्रश या सुई साझा न करना जरूरी है।“
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समय पर जांच और स्क्रीनिंग से इस बीमारी को शुरुआती चरण में ही पकड़ा जा सकता है। अगर लिवर फंक्शन टेस्ट में गड़बड़ी दिखे या कोई अस्पष्ट लक्षण हों, तो तुरंत जांच कराना जरूरी है। सही समय पर पहचान और इलाज से न केवल बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है, बल्कि जीवन भी बचाया जा सकता है।