- बरेली में एडीएम सिटी रह चुके हैं ओपी वर्मा
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) बरेली अदालत ने एक परिवाद पर सुनवाई करते हुए लखनऊ कृषि उत्पादन आयुक्त (एपीसी) कार्यालय में विशेष सचिव पद पर तैनात आईएस ओपी वर्मा को आईपीसी की धारा 324 और 504 के तहत विचारण के लिए समन जारी कर तलब किया है। ओपी वर्मा बरेली में एडीएम सिटी रह चुके हैं। उन पर चकबंदी विभाग के एक कर्मचारी ने कार्यालय में बंधक बनाकर मारपीट और गाली गलौज करने का आरोप लगाया है।
ओपी वर्मा लखनऊ में तैनात बताए जाते हैं। मामला 2019 का है, जो अब कोर्ट के कड़े रुख के बाद एक बार फिर गरमा गया है। परिवादी रमोद कुमार सक्सेना ने कोर्ट में अर्जी देकर आरोप लगाया था कि तत्कालीन एडीएम सिटी ने न सिर्फ अपने चेंबर में बुलाकर उनके साथ मारपीट की, बल्कि उन्हें जातिसूचक और भद्दी गालियां देते हुए झूठे मुकदमे में जेल भिजवा दिया। कोर्ट ने पुलिस की अन्वेषण आख्या और गवाहों के बयानों के आधार पर प्रथम दृष्टया मामला सही पाया और आरोपी अधिकारी को कोर्ट में हाजिर होने का फरमान सुना दिया।
चकबंदी विभाग के विवाद से जुड़ी है पूरी कहानी
इस पूरे मामले की जड़ें चकबंदी विभाग के एक पुराने विवाद और कूटरचित दस्तावेजों से जुड़ी हुई हैं। परिवादी रमोद कुमार सक्सेना बरेली में थाना इज्जतनगर स्थित बन्नूवाल कालोनी निवासी हैं। वह चकबंदी विभाग भुता में अहलमद पद पर तैनात थे। आरोप है कि साल 2006 में जब वह बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी के यहां पेशकार थे, तब पीठासीन अधिकारी रमाकान्त शुक्ला ने एक अपील में दो विपरीत आदेश पारित कर दिए थे। जब इस बात का खुलासा हुआ, तो खुद को बचाने के लिए विभाग द्वारा रमोद कुमार सक्सेना के खिलाफ ही कोतवाली में धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज करा दिया गया।
हालांकि, मई 2018 में अदालत ने रमोद कुमार सक्सेना को इस मामले में पूरी तरह दोषमुक्त पाकर बरी कर दिया। इसके बाद रमोद कुमार सक्सेना ने अपने ऊपर हुए उत्पीड़न को लेकर विभाग में चर्चा शुरू की और मानहानि की कार्रवाई की बात कही।
इस पर तत्कालीन अधिकारी उनसे रंजिश रखने लगे। रमोद कुमार सक्सेना का आरोप है कि 24 जनवरी 2019 की शाम करीब 5 बजे तत्कालीन एडीएम सिटी ओपी वर्मा ने उन्हें किसी बहाने से अपने चेंबर में बुलाया। चेंबर के भीतर चकबंदी विभाग के कई अन्य अधिकारी और कर्मचारी पहले से मौजूद थे, जिनमें रमाकान्त शुक्ला, प्रेमचन्द्र और सुनील कुमार शर्मा शामिल थे। आरोप है कि चेंबर में घुसते ही एडीएम सिटी ओपी वर्मा ने रमोद कुमार सक्सेना को मां-बहन की गंदी-गंदी गालियां देना शुरू कर दिया। चेंबर के कोने में एक सफेद रंग का डंडा रखा हुआ था। आरोप है कि तत्कालीन एडीएम सिटी ने वह डंडा उठाकर रमोद कुमार सक्सेना को बेरहमी से मारना-पीटना शुरू कर दिया। उनके साथ चेंबर में मौजूद अन्य कर्मचारियों ने भी लात-घूंसों से मारपीट की। इसके बाद रमोद कुमार सक्सेना पर दबाव बनाया गया कि वह चकबंदी विभाग में हुई फर्जी कार्रवाई की जिम्मेदारी अपने सिर ले लें, लेकिन जब उन्होंने इससे साफ इनकार कर दिया, तो उनके साथ और ज्यादा बर्बरता की गई।
फर्जी बयान पर हस्ताक्षर कराए और भेज दिया जेल
शिकायत अनुसार मारपीट के बाद एडीएम सिटी ने अपने पेशकार जयवीर सिंह से एक फर्जी बयान तैयार करवाया। रमोद कुमार सक्सेना को पुलिस के डंडे और लातों से बुरी तरह पीटने की धमकी देकर जबरन उस फर्जी कूटरचित दस्तावेज पर हस्ताक्षर करा लिए गए। उसी दिन रमोद कुमार सक्सेना के खिलाफ शांति भंग की धारा 151/107 सीआरपीसी के तहत फर्जी कार्रवाई करते हुए उन्हें कोतवाली पुलिस के हवाले कर दिया गया, ताकि वे अपनी आवाज न उठा सकें। अगले दिन 25 जनवरी 2019 को उन्हें जिला कारागार (जेल) भेज दिया गया। करीब एक हफ्ते बाद 31 जनवरी 2019 को नगर मजिस्ट्रेट की अदालत से उन्हें जमानत मिली और 1 फरवरी 2019 को वह जेल से बाहर आ सके। जेल से छूटने के बाद जब वह थाने गए, तो पुलिस ने उनकी रिपोर्ट दर्ज करने से साफ मना कर दिया और उन्हें टाल-मटोल कर भगा दिया। इसके बाद उन्होंने बरेली के एसएसपी को भी प्रार्थना पत्र दिया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। आखिरकार थक-हारकर पीड़ित ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
लोकसेवक को मिलने वाली सुरक्षा की दलील खारिज
अदालत में सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष की ओर से यह दलील देने की कोशिश की गई कि आरोपी एक लोकसेवक (सरकारी अधिकारी) हैं, इसलिए धारा 197 दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC)के तहत उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए शासन से अग्रिम मंजूरी (सेंक्शन) लेना अनिवार्य है। अदालत ने इस दलील को पूरी तरह से खारिज कर दिया। सीजेएम कोर्ट ने उच्चतम न्यायालय के विभिन्न विधिक सिद्धांतों और नजीरों का हवाला देते हुए अपने आदेश में स्पष्ट किया कि किसी अधीनस्थ कर्मचारी या परिवादी को चेंबर में बुलाकर मारना-पीटना, गाली देना या प्रताड़ित करना किसी भी लोकसेवक के पदीय कर्तव्य के निर्वहन के दायरे में नहीं आता है। कोर्ट ने कहा कि पद की शक्ति का दुरुपयोग करने वाले अधिकारी को इस तरह का विधिक संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
2 जुलाई को कोर्ट में पेश होने का आदेश
बरेली में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सुरेश कुमार दुबे ने मामले की पत्रावली, गवाहों (माखनलाल और सुनील) शपथ पत्र और पुलिस की जांच आख्या का गहन अवलोकन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि तत्कालीन एडीएम सिटी ओपी वर्मा के खिलाफ धारा 324 (जानबूझकर खतरनाक कृत्य से चोट पहुंचाना) और धारा 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमानित करना) के तहत मुकदमा चलाने के पर्याप्त आधार मौजूद हैं। अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि तत्कालीन अपर जिलाधिकारी (नगर) बरेली जो वर्तमान में लखनऊ में आईएएस अधिकारी हैं, के खिलाफ समन जारी किया जाए। कोर्ट ने परिवादी को आदेश दिया है कि वह गवाहों की सूची दाखिल करते हुए आवश्यक पैरवी अविलंब पूरी करे। इस मामले में अगली सुनवाई और आरोपी अधिकारी की अदालत में व्यक्तिगत उपस्थिति के लिए 2 जुलाई 2026 की तारीख मुकर्रर की गई है।