जागरण टुडे, कासगंज(उदित विजयवर्गीय)
नगर पालिका परिषद गंजडुंडवारा की विकास प्राथमिकताओं को देखकर नगरवासी अब तंज कसते हुए इसे "गंजडुंडवारा" नहीं बल्कि "ब्रेकरवारा" कहने लगे हैं। वजह भी कम दिलचस्प नहीं है। एक ओर नगर की सड़कों पर गड्ढों की भरमार है, वहीं दूसरी ओर 25 वार्डों में जगह-जगह स्पीड ब्रेकर बनाकर लाखों रुपये खर्च कर दिए गए हैं।
नगर की कई सड़कें ऐसी हैं जिन पर वाहन चलाना किसी परीक्षा से कम नहीं। कहीं डामर उखड़ा पड़ा है, कहीं सड़कें गहरे गड्ढों में तब्दील हो चुकी हैं और कहीं जलभराव ने हालात और खराब कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़कें ही इतनी टूटी हुई हैं कि वाहन चालक खुद-ब-खुद रफ्तार कम कर लेते हैं, फिर भी नगर पालिका ने स्पीड ब्रेकरों की ऐसी "फसल" उगा दी कि हर कुछ कदम पर वाहन उछलता नजर आता है।
नगर के लोगों का सवाल है कि आखिर जब सड़कों की मरम्मत सबसे बड़ी जरूरत थी, तब ब्रेकर निर्माण को इतनी प्राथमिकता क्यों दी गई, कई वार्डों में एक ही मार्ग पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कई स्पीड ब्रेकर बनाए गए हैं। लोगों का आरोप है कि सड़क सुधार की बजाय ब्रेकर निर्माण पर ध्यान देकर बजट खपाने का काम किया गया।
चर्चा यह भी है कि इन स्पीड ब्रेकरों के निर्माण पर लाखों रुपये खर्च किए गए हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या सभी ब्रेकर निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप बनाए गए हैं? क्या इनके निर्माण से पहले यातायात आवश्यकता का कोई सर्वे कराया गया था, क्या इनके लिए आवश्यक चेतावनी संकेतक और सुरक्षा मानकों का पालन किया गया। ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब नगरवासी तलाश रहे हैं।
जानकार बताते हैं कि भारतीय सड़क कांग्रेस (IRC) द्वारा स्पीड ब्रेकर निर्माण के स्पष्ट मानक निर्धारित हैं। ऊंचाई, चौड़ाई, डिजाइन और संकेतकों को लेकर नियम बने हुए हैं। यदि इन मानकों की अनदेखी की गई है तो यह न केवल वाहन चालकों की सुरक्षा के लिए खतरा है बल्कि सरकारी धन के उपयोग पर भी सवाल खड़े करता है।
स्थानीय नागरिकों सलमान और उद्योग व्यापार मंडल के नगर अध्यक्ष राम कुमार गुप्ता ने पूरे प्रकरण की तकनीकी एवं वित्तीय जांच की मांग उठानी शुरू कर दी है। उनका कहना है कि नगर पालिका को यह स्पष्ट करना चाहिए कि 25 वार्डों में कितने स्पीड ब्रेकर बनाए गए, उन पर कितना खर्च हुआ और किन मानकों के आधार पर उनकी स्वीकृति दी गई।
फिलहाल नगर में चर्चा का विषय यही है कि सड़कों के गड्ढे भरने से पहले ब्रेकरों की कतार लगाने की आखिर इतनी क्या जल्दी थी? और यदि विकास का यही मॉडल है तो फिर नगरवासियों का गंजडुंडवारा को "ब्रेकरवारा" कहना शायद गलत भी नहीं लगता।