कभी बैलगाड़ी पर निकली थी राम बारात, पेट्रोमैक्स की रोशनी में सजता था मंच, आज भव्य स्वरूप के साथ जारी परंपरा
जागरण टुडे, कासगंज(उदित विजयवर्गीय)
गंजडुंडवारा। आज रामलीला के मंच पर रंग-बिरंगी रोशनी, आधुनिक साउंड सिस्टम और भव्य सजावट के बीच जब प्रभु श्रीराम की लीलाओं का मंचन हो रहा है, तो शायद ही किसी को उस दौर की याद आती हो, जब बैलगाड़ी पर राम बारात निकलती थी और पेट्रोमैक्स की रोशनी में रामलीला का मंच सजता था। कलाकार भी कस्बे के ही लोग होते थे और आयोजन की भव्यता आधुनिक संसाधनों से नहीं, बल्कि लोगों की आस्था, सहयोग और निस्वार्थ सेवा से तय होती थी। वर्ष 1949 में आजादी के महज दो साल बाद बाग पंचायती प्रांगण से शुरू हुई गंजडुंडवारा की रामलीला आज 77 वर्षों का सफर तय कर चुकी है। इस लंबे सफर में पीढ़ियां बदल गईं, आयोजन का स्वरूप बदल गया, लेकिन पूर्वजों की मेहनत से शुरू हुई धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा आज भी कायम है।
तीन भाइयों ने निभाए थे राम, भरत और लक्ष्मण के किरदार
रामलीला के शुरुआती दौर की यादें संजोए 120 वर्षीय पंडित राममूर्ति मिश्र बताते हैं कि वर्ष 1949 में हुए पहले मंचन में कस्बे के जगदीश प्रसाद ने भगवान श्रीराम, उनके भाई पंडित पुरुषोत्तम मिश्र ने भरत और पंडित रामकृपाल ने लक्ष्मण की भूमिका निभाई थी। वहीं, मोहल्ला घासी निवासी पंडित श्रीनिवास ने रावण का किरदार निभाया था। उस दौर में बाहर से कलाकार बुलाने के बजाय कस्बे के लोग ही अलग-अलग पात्रों की भूमिका निभाते थे। एक ही परिवार के तीन भाइयों को राम, भरत और लक्ष्मण के रूप में मंच पर देखना लोगों के लिए खास आकर्षण होता था। सीमित संसाधनों के बावजूद कलाकारों और आयोजकों का उत्साह रामलीला को जीवंत बना देता था।
बैलगाड़ी पर निकले थे श्रीराम, गलियों में उमड़ता था पूरा कस्बा
आज की भव्य राम बारात के पीछे भी सादगी और समर्पण से जुड़ी एक यादगार परंपरा रही है। शुरुआती दौर में भगवान श्रीराम को बैलगाड़ी पर बैठाकर राम विवाह की बारात निकाली जाती थी। कस्बे के लोग पैदल ही बारात में शामिल होते थे। ढोल-नगाड़ों और शंखध्वनि के बीच जब बारात गलियों से गुजरती तो महिलाएं घरों के बाहर दीपक जलाकर उसका स्वागत करती थीं। राम बारात केवल धार्मिक शोभायात्रा नहीं, बल्कि पूरे कस्बे की सामूहिक भागीदारी का उत्सव हुआ करती थी। लोग अपने-अपने स्तर से सहयोग करते और इस आयोजन को सफल बनाने में जुट जाते थे।
मंदोदरी बनकर मंच पर उतरे थे प० राममूर्ति मिश्र
पंडित राममूर्ति मिश्र उस दौर के उन विरले लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने रामलीला की शुरुआती यात्रा को करीब से देखा और उसमें सक्रिय भूमिका भी निभाई। उन्होंने उस समय मंदोदरी का किरदार निभाया था। शुरुआती आयोजन से जुड़े अधिकांश लोग शायद अब इस दुनिया में नहीं हैं। ऐसे में राममूर्ति मिश्र की स्मृतियां गंजडुंडवारा की रामलीला के इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। रामलीला कमेटी की ओर से उन्हें सम्मानित भी किया जाता है, ताकि नई पीढ़ी इस परंपरा की शुरुआत और इसे आगे बढ़ाने वाले लोगों के योगदान से परिचित हो सके।
धर्मादा योजना ने दी आर्थिक मजबूती
धीरे धीरे दौर के साथ रामलीला का स्वरूप बढ़ने के साथ आयोजन के खर्च और व्यवस्थाओं की जरूरत भी बढ़ने लगी। ऐसे में कस्बे के प्रमुख गल्ला आढ़तियों ने धर्मादा योजना शुरू की। इसके तहत गल्ला बेचने आने वाले किसानों और बाहर से गल्ला खरीदने वाले व्यापारियों से सहयोग राशि एकत्र की जाती थी। इस व्यवस्था का लेखा-जोखा रखने के लिए दो मुनीम नियुक्त किए गए थे, जो सर्राफा बाजार स्थित धर्मादा कमेटी की दुकानों पर बैठते थे। धर्मादा के नाम पर एकत्र धन का उपयोग रामलीला के आयोजन के साथ गोशाला संचालन तथा अन्य धार्मिक और परमार्थ कार्यों में भी किया जाता था। इस सामूहिक व्यवस्था ने आयोजन को आर्थिक आधार दिया और समय के साथ रामलीला का स्वरूप भी भव्य होता चला गया।
हंडे की रोशनी बुझते ही गूंजती थी आवाज
आज मंच एलईडी और आधुनिक लाइटों से जगमगाता है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब मिट्टी के तेल से जलने वाले पेट्रोमैक्स यानी हंडों की रोशनी ही रामलीला की शान हुआ करती थी। मंच की रोशनी की जिम्मेदारी कस्बे के स्वर्गीय वीरेंद्र गुप्ता संभालते थे। लोग उन्हें प्यार से 'वीरेंद्र हंडे वाले' कहते थे। गांधी रोड निवासी उनके पुत्र मनोज कुमार गुप्ता बताते हैं कि मंचन के दौरान हंडे की हवा कम हो जाने या उसका मेंटल टूट जाने पर कई बार लीला रोकनी पड़ती थी। ऐसे में दर्शकों के बीच से आवाज उठती थी,'वीरेंद्र हंडे वाले कहां हैं। आवाज सुनते ही वीरेंद्र गुप्ता मंच की ओर दौड़ पड़ते और हंडे को ठीक कर दोबारा रोशनी की व्यवस्था करते थे। उस समय मंचन की निरंतरता बनाए रखने में उनकी भी भूमिका बेहद अहम थी।
आधुनिकता के बीच आज भी जीवित है पूर्वजों की विरासत
बाग पंचायती प्रांगण से स्थानीय कलाकारों और कस्बेवासियों के सहयोग से शुरू हुई गंजडुंडवारा की रामलीला आज 78 वे वर्ष मे भी आधुनिक मंच, बेहतर प्रकाश व्यवस्था और भव्य सजावट के साथ आयोजित हो रही है। हालांकि, इसकी असली ताकत उन लोगों का योगदान है, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बीच इस परंपरा की नींव रखी। गल्ला आढ़तियों की धर्मादा योजना, कलाकारों का समर्पण, बुजुर्गों की सेवा और सर्वसमाज का सहयोग इस आयोजन की ऐतिहासिक पहचान बने। बैलगाड़ी पर निकली राम बारात से लेकर आधुनिक व्यवस्थाओं तक का यह सफर बताता है कि किसी परंपरा की भव्यता केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि लोगों की आस्था और पीढ़ियों के समर्पण से बनती है। गंजडुंडवारा की रामलीला आज भी इसी विरासत को संजोए हुए है।