बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत शिक्षकों के लिए टेट (Teacher Eligibility Test) अनिवार्यता को लेकर प्रदेशभर में हलचल तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार और विभिन्न शिक्षक संगठनों की रिव्यू पिटीशन खारिज किए जाने के बाद शासन ने अब विशेष टीईटी (स्पेशल TET) आयोजित करने की तैयारी शुरू कर दी है। इसी क्रम में बरेली की जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) डॉ. विनीता ने जिले के सभी खंड शिक्षा अधिकारियों (बीईओ) को निर्देश जारी कर तीन दिन के भीतर विस्तृत रिपोर्ट उपलब्ध कराने को कहा है।
शासन ने सभी जिलों से यह जानकारी तलब की है कि बेसिक शिक्षा परिषद के प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत कितने शिक्षक टीईटी अथवा सीटेट (CTET) उत्तीर्ण हैं और कितने अभी तक यह पात्रता परीक्षा पास नहीं कर सके हैं। विभागीय स्तर पर यह आंकड़ा जुटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बढ़ी सक्रियता
गौरतलब है कि एक सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया था, जिसका प्रभाव देशभर के लगभग 25 लाख शिक्षकों पर पड़ने की बात कही जा रही है। फैसले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटीशन) दायर की थी। इसके अलावा प्राथमिक शिक्षक संघ समेत विभिन्न संगठनों और शिक्षकों की ओर से भी रिव्यू पिटीशन दाखिल की गई थी।
हालांकि, 29 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने सभी पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया। इसके साथ ही शिक्षकों को टीईटी उत्तीर्ण करने के लिए दी गई समय सीमा में एक वर्ष का अतिरिक्त विस्तार भी प्रदान किया गया। अब बेसिक शिक्षा परिषद के शिक्षकों को 31 अगस्त 2028 तक टीईटी या समकक्ष पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा।
विशेष टीईटी परीक्षा कराने की तैयारी
शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार, बड़ी संख्या में कार्यरत शिक्षकों के सामने पात्रता परीक्षा की चुनौती को देखते हुए सरकार विशेष टीईटी परीक्षा आयोजित करने पर विचार कर रही है। इसी उद्देश्य से प्रदेशभर के जिलों से आंकड़े एकत्र किए जा रहे हैं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कितने शिक्षक इस दायरे में आते हैं।
बरेली बीएसए डॉ. विनीता ने सभी बीईओ को निर्धारित प्रारूप में रिपोर्ट तैयार कर हर हाल में तीन दिन के भीतर उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। विभागीय अधिकारियों का मानना है कि आंकड़े मिलने के बाद शासन स्तर पर आगे की रणनीति तय की जाएगी।
शिक्षक संगठनों ने जताया विरोध
वहीं, दूसरी ओर, शिक्षक संगठनों में इस निर्णय को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है। शिक्षकों का कहना है कि केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2017 में किए गए संशोधन के आधार पर पुराने शिक्षकों पर टेट अनिवार्यता लागू करना न्यायसंगत नहीं है।
वरिष्ठ शिक्षक नेता हरीश बाबू शर्मा का कहना है कि टीईटी अनिवार्यता का कानून वर्ष 2010 में अस्तित्व में आया और उत्तर प्रदेश में इसे वर्ष 2011 से लागू किया गया। ऐसे में इससे पहले नियुक्त शिक्षकों पर इस नियम को लागू करना अन्यायपूर्ण और तानाशाहीपूर्ण कदम है। उनका तर्क है कि किसी भी कानून को पूर्व प्रभाव (बैक डेट) से लागू नहीं किया जाता और इतिहास में इसके बहुत कम उदाहरण मिलते हैं।
आंदोलन की तैयारी में शिक्षक संगठन
प्राथमिक शिक्षक संघ समेत कई शिक्षक संगठन इस मुद्दे को लेकर आंदोलन की रणनीति तैयार कर रहे हैं। संघ के नेताओं का कहना है कि सेवा सुरक्षा और शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी और लोकतांत्रिक दोनों स्तरों पर संघर्ष जारी रहेगा।
राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. दिनेश चंद्र शर्मा के नेतृत्व में व्यापक स्तर पर तैयारी शुरू कर दी गई है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों के सामने नई पात्रता परीक्षा की बाध्यता खड़ी करना उचित नहीं है।
शिक्षकों ने उठाए कई सवाल
शिक्षकों का तर्क है कि अन्य सरकारी सेवाओं में नियुक्ति के समय जो पात्रताएं निर्धारित होती हैं, उन्हीं के आधार पर चयन किया जाता है। उनका कहना है कि आईएएस, पीसीएस, नीट अथवा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के नियम नियुक्ति के वर्षों बाद कार्यरत कर्मचारियों पर लागू नहीं किए जाते।
शिक्षकों का कहना है कि खेल शुरू होने के बाद उसके नियम नहीं बदले जाते, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में दशकों से कार्यरत शिक्षकों पर नई शर्तें थोपी जा रही हैं। उनका दावा है कि इस निर्णय से देशभर के लाखों शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं। इस संबंध में प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजे गए हैं और संसद में भी इस मुद्दे पर संशोधन की मांग उठने लगी है।