जागरण टुडे। क्या आपने कभी सोचा है कि एक ही मंत्र का जप करने पर किसी व्यक्ति को शीघ्र सिद्धि और शुभ फल प्राप्त हो जाते हैं, जबकि कोई वर्षों तक जप करने के बाद भी अपेक्षित परिणाम नहीं पा पाता? क्या इसका कारण केवल श्रद्धा और भक्ति है, या इसके पीछे ज्योतिष एवं मंत्रशास्त्र का कोई गूढ़ रहस्य भी छिपा है? वास्तव में मंत्र साधना केवल जप तक सीमित नहीं है। इसके लिए योग्य गुरु की दीक्षा, साधक की पात्रता, जन्मकुंडली के अनुरूप मंत्र का चयन, जप की विधि और शास्त्रीय नियमों का पालन अत्यंत आवश्यक माना गया है। आइए जानते हैं—"मंत्र ऋणी या हम ऋणी" का सिद्धांत क्या है और इसका मंत्र साधना की सफलता से क्या संबंध है।
अधिकांश लोग वर्षों तक मंत्र-जप करते रहते हैं, फिर भी उन्हें अपेक्षित फल प्राप्त नहीं होता। इसका प्रमुख कारण केवल मंत्र का जप करना नहीं, बल्कि उसकी विधि, पात्रता और गुरु-दीक्षा का अभाव हो सकता है।
ज्योतिष एवं मंत्रशास्त्र के अनुसार मंत्र तभी शीघ्र फलदायी होता है जब वह किसी योग्य एवं सिद्ध गुरु द्वारा विधिवत् प्रदान किया गया हो। प्रत्येक मंत्र की अपनी ऊर्जा, नियम और साधना-पद्धति होती है। मंत्र जितना गोपनीय रखा जाता है, उसकी शक्ति उतनी ही प्रभावी मानी जाती है। इसलिए शास्त्रों में मंत्र को अनावश्यक रूप से सार्वजनिक न करने का निर्देश दिया गया है।
यदि कोई मंत्र अभी सिद्ध नहीं है, तो उसके लिए विभिन्न संस्कारों एवं शोधन विधियों का भी उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। केवल किसी भी मंत्र का चयन कर उसका जप प्रारंभ कर देना उचित नहीं माना गया है। मंत्र-जप का समय, काल, दिशा, आसन, जप संख्या तथा किस माला से जप किया जाए—इन सभी का विशेष महत्व है। हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रत्येक मंत्र के अनुसार विभिन्न मालाओं का विधान बताया है।
मंत्र साधना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है—"मंत्र ऋणी या हम ऋणी?" यदि साधक मंत्र का अधिकारी नहीं है अथवा उसकी जन्मकुंडली, गण, नक्षत्र एवं ग्रहस्थितियाँ उस मंत्र के अनुकूल नहीं हैं, तो मंत्र का फल विलंब से मिल सकता है या साधना में बाधाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। कई बार लोग कहते हैं कि अमुक मंत्र के जप के बाद उन्हें कष्ट या अशुभ अनुभव हुए। ऐसे अधिकांश मामलों में कारण मंत्र नहीं, बल्कि अनुचित चयन, नियमों की उपेक्षा अथवा गुरु के मार्गदर्शन का अभाव होता है।
योग्य गुरु साधक की आध्यात्मिक क्षमता, जन्मकुंडली तथा ग्रहयोगों का विचार कर यह निर्धारित करते हैं कि कौन-सा मंत्र उसके लिए उपयुक्त रहेगा और वह उसकी ऊर्जा को धारण करने में सक्षम है या नहीं। मंत्रशास्त्र में मंत्रों के लगभग 50 दोषों का भी वर्णन मिलता है, जिनका ज्ञान गंभीर साधक के लिए आवश्यक माना गया है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है—
"मंत्र महामनि बिषय ब्याल के।
मेटत कठिन कुअंक भाल के॥"
अर्थात् मंत्र ऐसी दिव्य महामणि है, जो विषय-विकार रूपी विषैले सर्प का नाश करती है तथा भाग्य के कठिन दोषों का भी शमन करने की सामर्थ्य रखती है।
शेष क्रमशः...
- सुमित विजयवर्गीय (Astro)