इस वर्ष गुरु पूर्णिमा महापर्व 29 जुलाई 2026 (बुधवार) को श्रद्धा एवं भक्ति भाव के साथ मनाया जाएगा। सनातन संस्कृति में गुरु को ईश्वर तक पहुँचाने वाला सेतु माना गया है। गुरु केवल ज्ञान का उपदेशक नहीं, बल्कि शिष्य के व्यक्तित्व, चरित्र और चेतना का निर्माता होता है।
संत कबीरदास के प्रसिद्ध दोहे "जाका गुरु भी अंधला, चेला खरा निरंध। अंधा-अंधा ठेलिया, दून्यूँ कूप पड़ंत॥" का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गुरु का चयन अत्यंत विवेक और सावधानी से करना चाहिए। गुरु का दायित्व केवल शिक्षा देना नहीं, बल्कि अपने सान्निध्य में आए कुपात्र को भी संस्कारों के माध्यम से सुपात्र बनाना है। सच्चा गुरु शिष्य को कभी पतन की ओर नहीं ले जाता, बल्कि यदि वह भटक जाए तो उसे सही मार्ग पर लाने के लिए स्वयं प्रयास करता है।
गुरु के व्यक्तित्व में ऐसी दिव्यता होनी चाहिए कि उसके दर्शन मात्र से कुमार्ग पर चल रहे व्यक्ति के मन में आत्मचिंतन और परिवर्तन का भाव जागृत हो जाए। वह बिना किसी स्वार्थ, लोभ या लालसा के शिष्य के लौकिक एवं पारलौकिक जीवन का कल्याण करे। शिष्य के लिए भी श्रद्धा, समर्पण और विश्वास अनिवार्य हैं। श्रेष्ठ गुरु बिना बताए ही शिष्य की कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करता है और उसके जीवन को उत्कृष्ट बनाने का प्रयास करता है।
एक आदर्श गुरु सदैव यही चाहता है कि उसका शिष्य ज्ञान, संस्कार और कर्म के क्षेत्र में उससे भी आगे बढ़कर समाज में आदर्श स्थापित करे। हनुमान चालीसा का शुभारंभ "श्री गुरु चरण सरोज रज..." से होता है, जो गुरु की सर्वोच्च महिमा का प्रतीक है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी कहा है, "गुरु बिन भव निधि तरइ न कोई, जौ बिरंचि संकर सम होई।" अर्थात गुरु के बिना संसार रूपी भवसागर से पार पाना संभव नहीं, चाहे व्यक्ति कितना ही विद्वान या शक्तिशाली क्यों न हो।
अर्थात गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सभी को श्रद्धालुओं से श्रद्धा और विवेक के साथ ऐसे गुरु का वरण करना चाहिए, जो सत्य, सेवा, सदाचार और आत्मबोध का मार्ग दिखाए। साथ ही गुरु के रूप में ऐसे व्यक्तियों से सावधान रहना चाहिए जो कालनेमी की भाँति छल और भ्रम का मार्ग अपनाते हों।
क्यों कि संत कबीर दास जी ने के इस दोहे के माध्यम से कहा है "ये तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। सीस दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥" अर्थात गुरु की कृपा ही ही जिससे जीवन में ज्ञान, विवेक, आत्मबल और आध्यात्मिक चेतना का प्रकाश होता है।
ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरेभ्यो नमः।
— सुमित विजयवर्गीय (एस्ट्रो)