2021 में बही पुलिया का काम आठ दिन पहले हुआ था शुरू, तब तक गांव में घुसने लगा पानी; ग्रामीण तंज कस बोले- बाढ पहले आयी या पुलिया निर्माण देर से हुआ शुरु
जागरण टुडे, कासगंज(उदित विजयवर्गीय)
पटियाली। कहते हैं, "समय पर किया गया काम ही राहत देता है, देर से किया गया काम सिर्फ अफसोस छोड़ जाता है।"पटियाली क्षेत्र के गंगा के तटीय क्षेत्र पर यही कहावत इन दिनों सच होती दिखाई दे रही है। क्यो कि चार साल पहले आई बाढ़ अपने साथ नगला नरपत की पुलिया बहाकर ले गई थी। तब उम्मीद थी कि अगली बरसात से पहले पुलिया बन जाएगी और ग्रामीणों को राहत मिलेगी। लेकिन यह उम्मीद चार साल तक सरकारी फाइलों में ही कैद रही। विडंबना यह रही कि जब गंगा का जलस्तर फिर बढ़ने लगा और बाढ़ का खतरा गांवों के सिर पर आ खड़ा होने को था, तभी पुलिया निर्माण का काम शुरू कराया गया। अब हालात यह हैं कि निर्माण पूरा होने से पहले ही बढ़ता जलस्तर पुलिया के समीप पहुंच चुका है और कई गांव गंगा के बढ़ते जलस्तर की चपेट में आने लगे हैं।
ग्रामीण दिनेश ने बताया वर्ष 2021 की बाढ़ में नगला नरपत की पुलिया बह गई थी। इसके बाद हर वर्ष ग्रामीण पुलिया निर्माण की मांग करते रहे, लेकिन जिम्मेदार विभागों की ओर से कोई ठोस पहल नहीं हुई। करीब आठ दिन पहले निर्माण कार्य शुरू कराया गया, लेकिन तब तक गंगा का जलस्तर तेजी से बढ़ने लगा। ग्रामीणों का कहना है कि अगर यही निर्माण गर्मी के मौसम में पूरा हो गया होता तो शायद गंगा का जलस्तर बढ़ने के समय लोगों को सुरक्षित आवागमन का रास्ता मिल जाता।
ग्रामीणों के बीच अब एक ही सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है -"आखिर चार साल तक इंतजार क्यों कराया गया, क्या पुलिया का निर्माण बाढ़ आने के समय ही शुरु होना था। लोगों का कहना है कि उन्हें पुलिया बनने से कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि खुशी है कि निर्माण शुरू हुआ, लेकिन समय ऐसा चुना गया जब जलस्तर बढ़ने का संभावित समय था।
उधर नगला नरपत में बढ़ते जलस्तर का असर लगातार गहराता जा रहा है। गंगा का पानी कई घरों में घुस चुका है। लोग अपने घरों से अनाज, कपड़े, जरूरी दस्तावेज और घरेलू सामान निकालकर ऊंचे स्थानों पर पहुंचा रहे हैं। कई परिवार सड़क किनारे और सुरक्षित स्थानों पर अस्थायी आश्रय लेने को मजबूर हैं। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के सामने भोजन, पेयजल और सुरक्षित ठिकाने की चिंता बढ़ती जा रही है। दूसरी ओर मवेशियों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना और उनके लिए चारे-पानी की व्यवस्था करना भी ग्रामीणों के लिए बड़ी चुनौती बनती दिख रही है।
इधर मूजखेड़ा, नगला दुर्जन, नगला खाना और राजेपुर कुर्रा सहित कई अन्य तटीय गांवों तक गंगा का पानी पहुंच चुका है। कई गांव चारों ओर से पानी से घिरकर टापूनुमा स्थिति में पहुंच गए हैं। ग्रामीणों दुर्वेश यादव के अनुसार इन गांवों का आवागमन प्रभावित हो चुका है और आवागमन के लिए केवल एक स्टीमर ही सहारा बना हुआ है। ऐसे में बीमार लोगों को अस्पताल पहुंचाने, बच्चों के लिए दूध व दवाइयां लाने, रोजमर्रा की जरूरत का सामान जुटाने और मवेशियों के लिए चारा-पानी की व्यवस्था करना भी मुश्किल होता जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जलस्तर इसी तरह बढ़ता रहा तो हालात और गंभीर हो सकते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने वर्षों पहले तटबंध निर्माण के लिए अपनी जमीन देने तक की सहमति दे दी थी, लेकिन तटबंध आज भी केवल कागजों में है। उनका मानना है कि यदि समय रहते तटबंध बन गया होता और नगला नरपत की पुलिया का निर्माण भी पहले ही पूरा हो गया होता, साथ ही वर्ष 2023 मे बाढ मे बही नगला जय किशन की पुलिया भी बना दी जाती तो आज कुछ गांवो को बाढ़ के बीच इतनी परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता।
ग्रामीणों का कहना है कि विकास कार्यों का उद्देश्य आपदा आने से पहले लोगों को राहत देना होता है, लेकिन यहां तस्वीर बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है। चार साल तक पुलिया निर्माण का इंतजार कराया गया और जब बाढ़ गांवों की चौखट तक पहुंच गई, तब काम शुरू हुआ। अब बढ़ते जलस्तर के बीच लोगों के मन में सिर्फ एक ही सवाल गूंज रहा है, "आखिर योजनाओं का लाभ समय रहते क्यों नहीं मिल पाता, और पुलिया पहले बनेगी या हर साल की तरह बाढ़ पहले आ जाएगी?"