पहले पीली मिट्टी डालकर गड्ढे भरे, विरोध हुआ तो अब उसी मिट्टी को निकलवाने की कवायद; लोग बोले- सड़क कम, प्रयोगशाला ज्यादा लग रही
जागरण टुडे, कासगंज(उदित विजयवर्गीय)
गंजडुंडवारा। कस्बा के एटा रोड की जर्जर सड़क इन दिनों मरम्मत से ज्यादा अपनी बदलती कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा में है। पहले नगर पालिका परिषद द्वारा कांवड़ यात्रा से पहले सड़क के गड्ढों में पीली मिट्टी डलवाकर उन्हें भरने का कार्य कराया गया। लेकिन जैसे ही इस व्यवस्था पर सवाल उठे और विरोध शुरू हुआ, प्रशासन ने यू-टर्न लेते हुए अब उन्हीं गड्ढों से मिट्टी निकलवाने का काम शुरू करा दिया है।
अब एटा रोड पर ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसे देखकर राहगीर भी मुस्कुराए बिना नहीं रह सके। जिन गड्ढों को एक दिन पहले मिट्टी डालकर भरा गया था, अब उन्हीं गड्ढों से मजदूर मिट्टी निकालते नजर आए। लोगों के बीच चर्चा रही कि "गड्ढे भरने से ज्यादा मेहनत तो अब उन्हें दोबारा खाली करने में लग रही है।"
गौरतलब है कि 28 जुलाई को जागरण टुडे में क्या ऐसे होगा भोले के भक्तो का स्वागत शीर्षक के साथ एटा रोड की बदहाल सड़क और कांवड़ यात्रा के दौरान शिवभक्तों को होने वाली संभावित परेशानियों को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया था। इसके बाद नगर पालिका ने गड्ढों में मिट्टी डलवाई, लेकिन स्थानीय लोगों एवं जागरण टुडे ने अपनी पड़ताल मे आशंका जताई कि बारिश में यही मिट्टी कीचड़ बन जाएगी और नंगे पैर चलने वाले कांवड़ियों के लिए फिसलन का कारण बनेगी।
विरोध के बाद प्रभारी अधिशासी अधिकारी एवं अपर उपजिलाधिकारी मोहम्मद नासिर ने स्वयं मौके का निरीक्षण किया और स्पष्ट निर्देश दिए कि गड्ढों में डाली गई मिट्टी हटाई जाए तथा सीमेंट-कंक्रीट से टिकाऊ मरम्मत कराई जाए। उनके निर्देश के बाद अब सड़क से मिट्टी हटाने का कार्य शुरू हो गया है।
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर स्थानीय लोगों में भी चर्चा का विषय बना हुआ है। कोई इसे "भरो-उखाड़ो अभियान" कह रहा है तो कोई मजाक में बोल रहा है कि "लगता है गड्ढों की भी किस्मत बदल रही है—कल भरे गए थे, आज फिर खाली हो रहे हैं।"
हालांकि लोगों का कहना है कि यदि आखिरकार सड़क की मरम्मत गुणवत्तापूर्ण तरीके से होती है और कांवड़ यात्रा के दौरान शिवभक्तों को सुरक्षित मार्ग मिल जाता है, तो देर से लिया गया सही फैसला भी स्वागत योग्य होगा। लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि शुरुआत में ही उचित सामग्री से मरम्मत कराई जाती, तो सरकारी संसाधनों और श्रम की इस दोहरी कवायद की नौबत शायद नहीं आती।