Friday, September 11, 2026

KASGANJ: आग तापने रुका, 'चोर' समझकर प्लास से उखाड़ दिए थे नाखून; 17 साल बाद अदालत ने सुनाई 7 साल की सजा

लेखक: udit kumar | Category: उत्तर प्रदेश | Published: August 4, 2026

KASGANJ: आग तापने रुका, 'चोर' समझकर प्लास से उखाड़ दिए थे नाखून; 17 साल बाद अदालत ने सुनाई 7 साल की सजा

सीजेएम अदालत का सख्त फैसला, क्रूरता को बताया अमानवीय कृत्य; दोषी पर जुर्माना भी लगाया

जागरण टुडे, कासगंज(उदित विजयवर्गीय)

न्याय मिलने में भले ही 17 वर्ष का लंबा इंतजार करना पड़ा, लेकिन अदालत के सख्त फैसले ने यह संदेश दे दिया कि कानून की पकड़ से कोई अपराधी बच नहीं सकता। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) खान जीशान मसूद की अदालत ने वर्ष 2009 के एक जघन्य मामले में आरोपी अनार सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 326 के तहत दोषी ठहराते हुए सात वर्ष के कठोर कारावास और 500 रुपये के अर्थदंड से दंडित किया है। अर्थदंड जमा न करने पर दोषी को एक माह का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा।

अभियोजन के अनुसार, सोरों क्षेत्र के लहरा वरकुला निवासी स्वर्गीय बादाम सिंह ने 6 जनवरी 2009 को दर्ज कराई रिपोर्ट में बताया था कि उनके साले वीरपाल 5 जनवरी की कड़ाके की ठंड में उनके घर आ रहे थे। रास्ता भटक जाने पर वह गांव गोयती स्थित अनार सिंह के ट्यूबवेल पर आग तापने के लिए रुक गए। इसी दौरान आरोपी ने उन्हें चोर समझ लिया और बिना किसी सत्यापन के शोर मचाकर पकड़ लिया। इसके बाद राम सिंह व अन्य लोगों के साथ मिलकर लाठी-डंडों से बेरहमी से पीटा गया। इतना ही नहीं, उनके पैरों को ईंटों से कुचला गया और प्लास से नाखून तक उखाड़ दिए गए। इस बर्बर हमले में वीरपाल गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

पुलिस विवेचना के बाद अनार सिंह और राम सिंह के विरुद्ध आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया गया। सुनवाई के दौरान राम सिंह की मृत्यु हो जाने के कारण वर्ष 2015 में उसके विरुद्ध कार्रवाई समाप्त कर दी गई, जबकि अनार सिंह के विरुद्ध मुकदमा जारी रहा।

अदालत में अभियोजन पक्ष ने चिकित्सीय साक्ष्य, मेडिकल रिपोर्ट तथा डॉक्टर की गवाही पेश की। साक्ष्यों से यह सिद्ध हुआ कि पीड़ित के पैरों के नाखून किसी औजार, विशेष रूप से प्लास से जबरन उखाड़े गए थे। न्यायालय ने इसे सामान्य मारपीट नहीं, बल्कि अत्यंत क्रूर, अमानवीय और गंभीर प्रकृति का अपराध माना। इसी आधार पर आरोपी को दोषी करार देते हुए सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।

अदालत की सख्त टिप्पणी

"किसी व्यक्ति को केवल शक के आधार पर इस तरह अमानवीय यातनाएं देना सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है। कानून ऐसे कृत्यों को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकता।"

यह फैसला उन लोगों के लिए भी कड़ा संदेश माना जा रहा है जो कानून अपने हाथ में लेकर किसी निर्दोष व्यक्ति के साथ हिंसा करने की कोशिश करते हैं।

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