गंगा के तटीय टापूनुमा गांवों से नाव के सहारे विद्यालय पहुंच रहे विद्यार्थी, किताबों के साथ हर दिन पार कर रहे बाढ़ का इम्तिहान
जागरण टुडे, कासगंज(उदित विजयवर्गीय)
कहते हैं कि "मुश्किलें रास्ते रोक सकती हैं, मंजिल नहीं।" यह बात इन दिनों पटियाली तहसील के गंगा के तटीय जलस्तर बढ़ने से प्रभावित गांवों के स्कूली बच्चे सच साबित कर रहे हैं। जनपद में पिछले तीन दिनों से गंगा का जलस्तर भले ही स्थिर हो गया हो, लेकिन उससे पहले हुई जलस्तर वृद्धि ने नगला दुर्जन, नगला दीपी, नगला नैनसुख, नगला जयकिशन, नगला खाना, नगला चतुरी, नगला जैली, नगला पदम, मूजखेड़ा और नगला हंसी सहित कई गांवों को चारों ओर से पानी से घेरकर टापूनुमा बना दिया है। सड़क संपर्क पूरी तरह टूट चुका है और लोगों की जिंदगी नाव व एक स्टीमर के भरोसे चल रही है। इन कठिन हालातों के बीच भी मूजखेड़ा और नगला दुर्जन सहित अन्य गांवो के स्कूली बच्चों ने पढ़ाई से समझौता नहीं किया है।
हर सुबह जब गांव के चारों ओर सिर्फ पानी ही पानी दिखाई देता है, तब कंधों पर बस्ता टांगे बच्चे नाव का इंतजार करते हैं। नाव किनारे लगते ही वे उसमें सवार होकर लहरों के बीच सफर तय करते हैं और दूसरी ओर उतरने के बाद पैदल चलकर अपने विद्यालय पहुंचते हैं। यह अब उनकी रोजमर्रा की दिनचर्या बन चुकी है।
इन बच्चों की आंखों में डर जरूर है, लेकिन उससे कहीं बड़ा सपना पढ़-लिखकर जीवन में आगे बढ़ने का है। शायद यही वजह है कि पानी ने गांवों के रास्ते रोक दिए, लेकिन विद्यालय जाने की उनकी राह नहीं रोक सका। किताबों से उनका रिश्ता इतना मजबूत है कि बढा जलस्तर भी उनके शिक्षा के संकल्प को डिगा नहीं पा रहा।
ग्रामीण उर्वेश का कहना है कि इन बच्चों का हौसला पूरे क्षेत्र के लिए मिसाल है। उनका कहना है कि यदि जलस्तर दोबारा बढ़ा तो सबसे पहले बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होगी। इसलिए समय रहते प्रशासन को विशेष व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि शिक्षा का यह सफर बीच में न रुके।
ग्रामीणों का कहना है कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद बच्चों की विद्यालय पहुंचने की ललक काबिले-तारीफ है। उनका मानना है कि जिन बच्चों में इतनी छोटी उम्र में शिक्षा के प्रति इतना समर्पण है, उनके भविष्य को सुरक्षित रखना समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी है। लोगों ने मांग की है कि पानी मे डूबे गांवों के विद्यार्थियों के लिए अतिरिक्त नावों की व्यवस्था की जाए, ताकि उन्हें घंटों इंतजार न करना पड़े और वे सुरक्षित तरीके से विद्यालय पहुंच सकें।
जलस्तर बढ़ने से डूबे इन गांवों की सड़कें डूब चुकी हैं, लेकिन इन बच्चों के हौसले बरकरार है। हर सुबह जब ये स्कूली बच्चे बस्ता कंधे पर टांगकर नाव में बैठते हैं और लहरों को पार कर विद्यालय की ओर बढ़ते हैं, तब उनके साथ केवल किताबें ही नहीं, बल्कि उनके माता-पिता के सपने, बेहतर भविष्य की उम्मीद और शिक्षा के प्रति अटूट विश्वास भी सफर करता है।
ग्रामीणों का कहना है कि गंगा का जलस्तर कुछ समय बाद कम हो जाएगा, लेकिन यदि इन बच्चों की पढ़ाई रुक गई तो उसका असर पूरी जिंदगी पर पड़ेगा। इसलिए वे चाहते हैं कि प्रशासन जलस्तर बढ़ने से प्रभावित गांवों के विद्यार्थियों की शिक्षा हर हाल में जारी रखने के लिए अतिरिक्त व्यवस्था सुनिश्चित करे।