राहत की नावें हर बार पहुंचती हैं, अफसर भी आते हैं... मगर पानी उतरते ही गांवों का दर्द और वादे दिए जात है भुला
जागरण टुडे, कासगंज(उदित विजयवर्गीय)
पटियाली। गंगा हर साल अपना रास्ता नहीं बदलती, लेकिन हर साल हजारों लोगों की जिंदगी जरूर बदल जाती है। बरसात आते ही गंगा का जलस्तर बढ़ता है, गांव पानी से घिर जाते हैं, लोग अपने घरों का सामान समेटने लगते हैं और बच्चों की पढ़ाई से लेकर किसानों की फसलों तक सब कुछ बाढ़ की भेंट चढ़ने लगता है। फिर शुरू होता है राहत का दौर,अधिकारी पहुंचते हैं, नावें चलती हैं, राहत सामग्री बांटी जाती है, चिकित्सा शिविर लगते हैं और बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन जैसे ही पानी उतरता है, गांवों का दर्द भी सरकारी फाइलों के नीचे दब जाता है।
वर्तमान मे जलस्प जलस्तर बढ़ने का दंश झेल रहे पटियाली तहसील के गंगा तटीय नगला दुर्जन, नगला दीपी, नगला नैनसुख, नगला जयकिशन, नगला खाना, नगला चतुरी, नगला जैली, नगला पदम, मूजखेड़ा, नगला हंसी, नगला नरपत, राजेपुर कुर्रा सहित दर्जनभर गांवो के लोगों की जिंदगी में यह कोई नई कहानी नहीं है। यह हर साल दोहराया जाने वाला ऐसा दर्द है, जिसकी आदत तो पड़ गई है, लेकिन पीड़ा आज भी उतनी ही गहरी है। हर बरस लोग यही सोचते हैं कि शायद इस बार कोई स्थायी समाधान निकलेगा, तटबंध मजबूत होंगे, कटान रुकेगा, सड़कें ऊंची होंगी और गांवों को बाढ़ से राहत मिलेगी। लेकिन बरसात गुजरते ही उम्मीदें भी सूख जाती हैं।
ग्रामीण मुन्ना लाल कहते हैं कि हर साल राहत पैकेट तो मिल जाते हैं, लेकिन राहत भरा जीवन नहीं मिलता। नावें चलती हैं, लेकिन स्थायी पुल नहीं बनते। चिकित्सा शिविर लगते हैं, लेकिन ऐसी व्यवस्था नहीं बनती कि हर साल गांवों को इस संकट से न गुजरना पड़े। बिजली काट दी जाती है, स्कूलों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है, खेत डूब जाते हैं और परिवारों की रातें चिंता में गुजरती हैं। फिर भी साल बीतते ही सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है।
सबसे अधिक दर्द तब होता है, जब छोटे-छोटे बच्चे नाव से स्कूल जाने को मजबूर होते हैं, बुजुर्ग दवा के लिए घंटों इंतजार करते हैं और किसान अपनी पूरी सालभर की मेहनत को पानी में डूबते हुए बेबस आंखों से देखते रह जाते हैं। बाढ़ सिर्फ खेत और मकान नहीं डुबोती, यह लोगों के सपनों, मेहनत और भविष्य को भी अपने साथ बहा ले जाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें राहत सामग्री से शिकायत नहीं है, क्योंकि वह आपदा की घड़ी में जरूरी है। लेकिन अब वे राहत नहीं, समाधान चाहते हैं। उनका कहना है कि अगर हर साल राहत शिविर लगाए जा सकते हैं, नावें चलाई जा सकती हैं और करोड़ों रुपये बचाव कार्यों पर खर्च किए जा सकते हैं, तो आखिर स्थायी तटबंध, सुरक्षित सड़कें और बाढ़ से बचाव की मजबूत योजना क्यों नहीं बन सकती?
गांवों के लोगों की आंखों में आज भी एक ही सवाल तैर रहा है, क्या हमारी जिंदगी हर साल बाढ़ और राहत के भरोसे ही कटेगी, या कभी ऐसा दिन भी आएगा जब बरसात आएगी, गंगा बहेगी, लेकिन गांवों में डर नहीं, सुकून होगा।