सिढपुरा क्षेत्र के वाजिदपुर में इंटरलॉकिंग-नाली के नाम पर 9.33 लाख के खेल का खुलासा; शासन की जांच में शिकायत पूरी तरह सही, आयुक्त ने तत्काल सख्त कार्रवाई के दिए निर्देश
जागरण टुडे, कासगंज(उदित विजयवर्गीय)
कासगंज। सरकारी विकास कार्यों में भ्रष्टाचार किस तरह कागजों पर माप और भुगतान के जरिए सरकारी धन को ठिकाने लगाने का खेल बन सकता है, इसकी तस्वीर सिढ़पुरा विकासखंड की ग्राम पंचायत वाजिदपुर में सामने आई है। यहां ट्रांसफार्मर से सुनील के खोखे तक इंटरलॉकिंग और नाली निर्माण के नाम पर फर्जी मेजरमेंट बुक (एमबी) तैयार कर करीब 9.33 लाख रुपये गलत तरीके से निकालने की शिकायत की गई थी। शासन स्तर से कराई गई जांच में शिकायत पूरी तरह सही पाई गई है।
मामले में तत्कालीन खंड विकास अधिकारी, तत्कालीन लेखाकार/आंकिक और अवर अभियंता को पूरी तरह दोषी ठहराया गया है। अब ग्राम्य विकास विभाग के आयुक्त कार्यालय ने मुख्य विकास अधिकारी कासगंज को दोषी अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध तत्काल सख्त कार्रवाई कर शासन और आयुक्त कार्यालय को कृत कार्रवाई से अवगत कराने के निर्देश दिए हैं।
स्वीकृति कुछ और, एमबी का खेल कुछ और
मामला मार्च 2025 में मनरेगा योजना के तहत कराए गए इंटरलॉकिंग और नाली निर्माण कार्य से जुड़ा है। कार्य के लिए 8,86,701 रुपये की स्वीकृति निर्धारित थी। नियमानुसार भुगतान ग्राम पंचायत के खाते से होना था।
शिकायत के मुताबिक क्षेत्र पंचायत सिढ़पुरा की ओर से जूनियर इंजीनियर के माध्यम से फर्जी एमबी तैयार कर करीब 9,33,000 रुपये गलत तरीके से निकाल लिए गए। यानी जिस कार्य की स्वीकृत राशि 8.86 लाख रुपये थी, उसमें भुगतान करीब 9.33 लाख रुपये तक पहुंच गया।
शिकायत से शासन तक पहुंचा मामला
मामले की शिकायत पूर्व विधायक एवं भाजपा नेता ममतेश शाक्य ने 28 जून 2026 को उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य से की थी। शासन ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए ग्राम्य विकास विभाग की उपायुक्त सुमनलता को जांच अधिकारी नामित किया। इसके बाद जांच अधिकारी ने स्थलीय सत्यापन सहित मामले के विभिन्न बिंदुओं की जांच की और 7 अगस्त 2026 को जांच आख्या उपलब्ध कराई।
जांच रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया कि क्षेत्र पंचायत सिढ़पुरा द्वारा वाजिदपुर में कराए गए उक्त कार्य में फर्जी एमबी कराकर लगभग 9.33 लाख रुपये गलत तरीके से निकाले जाने की शिकायत स्थलीय जांच में पूर्णतः सही पाई गई।
जांच रिपोर्ट ने खोल दी जिम्मेदारों की परत
जांच में तत्कालीन खंड विकास अधिकारी महेंद्र पाल सिंह, तत्कालीन लेखाकार/आंकिक राजकुमार और अवर अभियंता (लघु सिंचाई) अमर सिंह को इस पूरे मामले में पूर्ण रूप से दोषी ठहराया गया है।
यानी मामला महज भुगतान में तकनीकी चूक तक सीमित नहीं रहा। शासन को भेजी गई जांच आख्या में फर्जी एमबी और गलत तरीके से धन निकाले जाने की शिकायत को सही पाया गया और इसके लिए तीन तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों को सीधे तौर पर दोषी माना गया।
आयुक्त कार्यालय ने मांगी तत्काल कार्रवाई
13 अगस्त 2026 को संयुक्त आयुक्त, ग्राम्य विकास, उत्तर प्रदेश गिरीश कुमार पाठक की ओर से मुख्य विकास अधिकारी कासगंज को भेजे गए पत्र में जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि दोषी पाए गए अधिकारियों/कर्मचारियों के विरुद्ध तत्काल सख्त कार्रवाई की जाए।
पत्र में यह भी कहा गया है कि की गई कार्रवाई से शासन और आयुक्त कार्यालय को अवगत कराया जाए। यानी अब मामला जांच पूरी होने के बाद कार्रवाई के अगले चरण में पहुंच चुका है।
लेबर का भुगतान हुआ, मैटेरियल का 7.69 लाख बकाया
मामले में ग्राम प्रशासक रेखारानी के अनुसार कार्य के तहत लेबर और राजमिस्त्री के 1,00,157 रुपये का भुगतान किया जा चुका है, जबकि मैटेरियल के 7,69,995 रुपये का भुगतान अभी बकाया बताया गया है।
यहीं से पूरा मामला और पेचीदा हो जाता है—जब ग्राम पंचायत स्तर पर मैटेरियल भुगतान बकाया बताया जा रहा है, तो जांच में सामने आया करीब 9.33 लाख रुपये का भुगतान आखिर किस आधार पर और किस प्रक्रिया के तहत कराया गया? यही सवाल अब जिम्मेदारों की जवाबदेही तय करने के केंद्र में है।
कार्रवाई और सरकारी धन की रिकवरी पर नजर
शासन से लेकर आयुक्त ग्राम्य विकास कार्यालय तक जांच रिपोर्ट पहुंचने और दोषियों के विरुद्ध तत्काल सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए जाने के बाद अब निगाहें विभागीय कार्रवाई पर हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि फर्जी एमबी तैयार कराने और सरकारी धन के गलत भुगतान के लिए दोषी ठहराए गए अधिकारियों-कर्मचारियों पर क्या कार्रवाई होगी और गलत तरीके से निकाली गई धनराशि की रिकवरी कैसे होगी।
मामले को लेकर जिला विकास अधिकारी सुभाष चन्द्र ने बताया कि योजना में क्षेत्र पंचायत की ओर से किए भुगतान की जांच रिपोर्ट शासन से प्राप्त हुई है। मामले में संबंधित अधिकारियों को नोटिस भेजे जाने की प्रक्रिया की जा रही है।