नगर निगम से जुड़े निर्माण कार्यों में कथित फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों के इस्तेमाल के मामले लगातार सामने आने से टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। पहले भदौरिया कंस्ट्रक्शन के खिलाफ कथित फर्जी अनुभव प्रमाणपत्र लगाए जाने के मामले में मुकदमा दर्ज हुआ और अब मैसर्स मथुरा कंस्ट्रक्शन के खिलाफ भी कथित कूटरचित दस्तावेज और धोखाधड़ी के आरोप में सदर कोतवाली में एफआईआर दर्ज कराई गई है।
मथुरा कंस्ट्रक्शन के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल पुलिस की अगली कार्रवाई को लेकर है। क्या जांच केवल दस्तावेजों की पड़ताल और एफआईआर तक सीमित रहेगी या फिर दस्तावेज तैयार करने, जमा करने और टेंडर प्रक्रिया में उनके इस्तेमाल की पूरी कड़ी खंगाली जाएगी? पुलिस की जांच में यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित लोगों की जिम्मेदारी भी तय करनी होगी।
भदौरिया कंस्ट्रक्शन के मामले में भी उठे थे सवाल
कुछ समय पहले भदौरिया कंस्ट्रक्शन से जुड़े मामले में कथित फर्जी अनुभव प्रमाणपत्र लगाए जाने का मामला सामने आया था। शिकायत और जांच के बाद इस मामले में मुकदमा दर्ज कराया गया था। 19 अगस्त को रिपोर्ट दर्ज होने के बाद से ही इस मामले की जांच और आगे की कार्रवाई को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
खास तौर पर फर्म के संचालक सुनील सिंह से जुड़ी संपत्तियों और पूरे प्रकरण की गहन जांच को लेकर सवाल उठाए गए हैं। यह भी देखा जाना है कि जिन दस्तावेजों के आधार पर सरकारी काम हासिल करने का प्रयास किया गया, उनकी वास्तविकता क्या थी और उन्हें तैयार कराने अथवा इस्तेमाल करने में किन लोगों की भूमिका रही।
अब मथुरा कंस्ट्रक्शन पर मुकदमा
इसी बीच नगर निगम ने मैसर्स मथुरा कंस्ट्रक्शन के खिलाफ कथित कूटरचित दस्तावेज और धोखाधड़ी के मामले में सदर कोतवाली में मुकदमा दर्ज कराया है। एफआईआर दर्ज होने के साथ ही अब जांच की दिशा महत्वपूर्ण हो गई है।
पुलिस को यह पता लगाना होगा कि कथित दस्तावेज कहां तैयार हुए, उनकी सत्यता की जांच कैसे हुई, उन्हें नगर निगम के समक्ष किस उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया और इस पूरी प्रक्रिया में फर्म से जुड़े किन लोगों की भूमिका रही। जरूरत पड़ने पर दस्तावेजों की तकनीकी अथवा फोरेंसिक जांच भी कराई जा सकती है।
एफआईआर के बाद असली परीक्षा जांच की
सरकारी काम हासिल करने के लिए यदि किसी फर्म की ओर से फर्जी या कूटरचित दस्तावेज इस्तेमाल किए जाने के आरोप जांच में सही साबित होते हैं तो मामला सिर्फ ठेकेदार तक सीमित नहीं रहेगा। इससे नगर निगम की टेंडर प्रक्रिया की निगरानी, दस्तावेजों के सत्यापन और संबंधित स्तर पर बरती गई सावधानी पर भी सवाल उठेंगे।
ऐसे में पुलिस जांच में यह भी सामने आना जरूरी है कि दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ और कथित गड़बड़ी समय रहते पकड़ में क्यों नहीं आई। साथ ही, यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका जांच में सामने आती है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय किए जाने की जरूरत होगी।
भदौरिया कंस्ट्रक्शन के बाद मथुरा कंस्ट्रक्शन पर दर्ज मुकदमे ने नगर निगम से जुड़े ठेकों और दस्तावेजी प्रक्रिया को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अब देखना यह है कि पुलिस जांच आरोपों की तह तक पहुंचती है या मामला सिर्फ एफआईआर दर्ज होने तक सिमटकर रह जाता है।