टूटे पाइप और लीकेज से रोजाना बर्बाद हो रहा हजारों लीटर पानी, कई वार्डों में कम प्रेशर से लोग परेशान, तो कही पाइप लाइन बिछी लेकिन एक बूंद नहीं पहुंचा पानी
जागरण टुडे, कासगंज(उदित विजयवर्गीय)
गंजडुंडवारा। ‘जल ही जीवन है’... यह संदेश सरकारी अभियानों, पोस्टरों और बैठकों में खूब सुनाई देता है। जल संरक्षण को लेकर योजनाएं भी बनती हैं और दावे भी किए जाते हैं, लेकिन गंजडुंडवारा में तस्वीर कुछ अलग ही कहानी बयां कर रही है। यहां नगर पालिका क्षेत्र में जगह-जगह पाइपलाइन लीकेज और टूटे पाइपों से पानी सड़कों और नालियों में बह रहा है। यानी जिस पानी की एक-एक बूंद बचाने की अपील की जाती है, वही पानी जिम्मेदारों की नजरों के सामने बेधड़क बहकर बर्बाद हो रहा है।
जागरण टुडे पड़ताल में मोहल्ला घनपाल में टूटे पाइप से लगातार पानी बहने की स्थिति सामने आई है। वहीं सुदामापुरी रोड पर पुरानी सब्जी मंडी गेट के पास पाइपलाइन में लीकेज के चलते पानी सड़क पर बहता नजर आया। इसके अलावा नगर क्षेत्र में कई अन्य स्थानों पर भी लीकेज और क्षतिग्रस्त पाइपों की शिकायतें सामने आ रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन लीकेजों से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में पेयजल बर्बाद हो रहा है, लेकिन इन्हें दुरुस्त कराने की जिम्मेदारी संभालने वाला तंत्र मानो इस बर्बादी से बेखबर है।
विडंबना यह है कि एक तरफ पाइपलाइन से पानी बहकर नालियों में पहुंच रहा है और दूसरी तरफ कई वार्डों में लोग कम प्रेशर की समस्या से जूझ रहे हैं। लोगों के मुताबिक पानी की आपूर्ति में पर्याप्त दबाव नहीं होने से घरों तक पानी पहुंचने में परेशानी होती है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब पानी की कमी और कम प्रेशर की शिकायतें हैं तो उपलब्ध पानी को लीकेज के जरिए सड़कों पर बहने से रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही।
आठ लाख खर्च, फिर भी पानी की एक बूंद नहीं
नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करने वाला एक और मामला वार्ड 17 से जुड़ा है। स्थानीय लोगों के मुताबिक विगत वर्षों में करीब आठ लाख रुपये की लागत से पाइपलाइन विस्तार का कार्य कराया गया था। उम्मीद थी कि नई पाइपलाइन से लोगों के घरों तक पानी पहुंचेगा, लेकिन लंबे समय बाद भी लोगों को इसका लाभ नहीं मिल सका।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस लाइन से अब तक किसी को कनेक्शन तक नहीं दिया गया है। इतना ही नहीं, लोगों के बीच यह चर्चा भी है कि पाइपलाइन को मुख्य पाइपलाइन से जोड़ा ही नहीं गया। यदि यह बात जांच में सही पाई जाती है तो सवाल केवल पाइप बिछाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खर्च हुए सरकारी धन से लेकर योजना के उद्देश्य और उसकी उपयोगिता तक पर सवाल खड़े होंगे।
एक तरफ लाखों रुपये खर्च कर पाइपलाइन विस्तार का दावा और दूसरी तरफ उसी लाइन से पानी की एक बूंद तक लोगों को न मिलना नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर पाइपलाइन किसके लिए बिछाई गई। यदि कनेक्शन नहीं दिए गए तो योजना का उद्देश्य क्या था। और यदि लाइन मुख्य पाइपलाइन से जुड़ी ही नहीं है तो काम पूरा मानकर भुगतान किस आधार पर किया गया—इन सवालों का जवाब जिम्मेदार अधिकारियों से अपेक्षित है।
‘जल संरक्षण’ का संदेश और सड़कों पर बहता पानी
नगर पालिका प्रशासन के सामने चुनौती केवल लीकेज बंद कराने की नहीं है, बल्कि पेयजल व्यवस्था को व्यवस्थित करने की भी है। जिस शहर में एक ओर लोगों को पानी के लिए कम प्रेशर की परेशानी झेलनी पड़ रही हो, वहीं दूसरी ओर पाइपलाइन से पानी लगातार बहता रहे तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते लीकेज दुरुस्त कर दिए जाएं और क्षतिग्रस्त पाइपों को बदला जाए तो पानी की बर्बादी रोकने के साथ-साथ कई इलाकों में आपूर्ति का दबाव भी सुधर सकता है। लेकिन फिलहाल हालात ऐसे हैं कि पानी बचाने के सरकारी संदेश और जमीन पर बहते पानी के बीच साफ अंतर दिखाई दे रहा है।
अब सवाल यह है कि नगर पालिका प्रशासन इन लीकेजों की सुध कब लेगा। वार्ड 17 में लाखों रुपये की लागत से बिछाई गई पाइपलाइन की वास्तविक स्थिति की जांच कब होगी। क्या यह पता लगाया जाएगा कि लाइन मुख्य पाइपलाइन से जुड़ी है या नहीं और यदि जुड़ी है तो लोगों को कनेक्शन क्यों नहीं मिले।
कागजों में जल संरक्षण के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन सड़कों और नालियों में बहता पानी उन दावों की जमीनी तस्वीर जरूर दिखा रहा है। अब देखना यह है कि नगर पालिका प्रशासन इस बहते पानी को सिर्फ नाली तक पहुंचने देगा या जिम्मेदारी तय कर पाइपलाइन व्यवस्था को भी पटरी पर लाएगा।